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VAGHELA DHRUVRAJ

Drama Romance Tragedy

5.0  

VAGHELA DHRUVRAJ

Drama Romance Tragedy

बस नंबर.27

बस नंबर.27

19 mins
16

वडोदरा शहर की सुबहें हमेशा से निरव को पसंद थीं। शायद इसलिए नहीं कि वे बहुत खूबसूरत होती थीं , बल्कि इसलिए कि सुबह के समय शहर अभी पूरी तरह जागा नहीं होता था। उस आधे जागे हुए शहर में उसे अपने जैसा सुकून मिलता था। सड़कों पर गाड़ियों की आवाज़ कम होती, चाय की दुकानों पर दिन की पहली केतली चढ़ रही होती और बस स्टॉप पर खड़े लोग अभी दिनभर की भागदौड़ से अनजान दिखाई देते। 
       
     पिछले एक साल से निरव की ज़िंदगी लगभग एक जैसी थी। सुबह सात बजे घर से निकलना, बस नंबर 27 पकड़ना, कोचिंग जाना, दोपहर में लाइब्रेरी या रीडिंग रूम में पढ़ना और फिर शाम को घर लौट जाना। प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते-करते उसकी दुनिया किताबों और नोट्स के बीच सिमट गई थी।

उस सुबह भी कुछ अलग नहीं था।
बस नंबर 27 हमेशा की तरह भीड़ से भरी हुई थी। निरव खिड़की के पास वाली सीट पर बैठा था और बाहर गुजरते हुए पेड़ों को देख रहा था। उसे सफ़र के दौरान बात करना कभी पसंद नहीं था। यही वजह थी कि वह हमेशा खिड़की वाली सीट चुनता था। लोग बाहर का दृश्य देखकर चुप हो जाते हैं, यह उसका अनुभव था।

बस अगले स्टॉप पर रुकी।

कुछ लोग उतरे , कुछ चढ़े।

और तभी एक लड़की लगभग दौड़ते हुए बस में चढ़ी। उसके हाथ में फ़ाइल थी , कंधे पर बैग और चेहरे पर ऐसी घबराहट जैसे दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण काम छूटने वाला हो। वह सीटें ढूँढने लगी। फिर उसकी नज़र निरव के पास वाली खाली सीट पर पड़ी। बिना कुछ सोचे वह आकर बैठ गई। बैठते ही उसने लंबी साँस ली।

"बच गई।"

निरव ने उसकी तरफ़ देखा।

लड़की मुस्कुरा रही थी। "अगर ये बस छूट जाती ना ,तो आज सर फिर पूरी क्लास के सामने बेइज़्ज़ती करते।"

निरव ने कोई जवाब नहीं दिया। वह फिर बाहर देखने लगा।

दो सेकंड की चुप्पी रही। फिर लड़की बोली "वैसे तुम बहुत कम बोलते हो क्या?"

निरव ने उसकी तरफ़ देखा। "क्या?"

"मैं पिछले तीस सेकंड से लगातार बोल रही हूँ।"

निरव पहली बार हल्का-सा मुस्कुराया। "मुझे नहीं पता था कि मुझे जवाब देना ज़रूरी है।"

लड़की ज़ोर से हँस पड़ी। इतना ज़ोर से कि सामने बैठे दो लोग पलटकर देखने लगे। "अच्छा है। मज़ाक भी कर लेते हो।"

उसने हाथ आगे बढ़ाया। "धारा।"

निरव ने कुछ पल उसे देखा। फिर हाथ मिलाया। "निरव।"

"अच्छा नाम है।"

"धन्यवाद।"

"वैसे तुम्हें पता है?"

"क्या?"

"तुम्हारा चेहरा देखकर लगता है कि तुम या तो बहुत पढ़ते हो या बहुत दुखी रहते हो।" निरव कुछ सेकंड तक उसे देखता रहा। उसे समझ नहीं आया कि इस लड़की को पहली मुलाक़ात में ऐसी बातें करने का अधिकार किसने दिया है। लेकिन धारा शायद उन लोगों में से थी जिन्हें किसी अधिकार की ज़रूरत नहीं होती। जो मन में आता था , बोल देती थी। और यही उसकी सबसे बड़ी खूबी भी थी और सबसे बड़ी समस्या भी।

बस अगले स्टॉप पर रुकी। धारा उठी। उतरते हुए बोली ,
"कल मिलते हैं।"

निरव कुछ कह पाता ,उससे पहले वह भीड़ में गायब हो चुकी थी। उस दिन शाम तक निरव को उसका चेहरा याद रहा। और यह बात उसे थोड़ी अजीब लगी। क्योंकि आमतौर पर उसे लोगों के चेहरे याद नहीं रहते थे। 

अगले दिन वही हुआ।

फिर अगले दिन।

फिर उसके अगले दिन। धीरे-धीरे बस नंबर 27 की वह सीट दोनों की हो गई। अगर निरव पहले पहुँचता तो धारा के लिए सीट रोक लेता। अगर धारा पहले पहुँचती तो किसी को वहाँ बैठने नहीं देती। और फिर दोनों का रोज़ का सफ़र शुरू हो जाता। असल में धारा को बातचीत पसंद नहीं थी। उसे बातचीत से प्यार था। वह किसी भी विषय पर बोल सकती थी। राजनीति , फ़िल्में , परीक्षा , पड़ोसी , चाय , मौसम , बचपन… कुछ भी।

निरव उसे देखता रहता था। उसे समझ नहीं आता था कि कोई इंसान इतना बेफ़िक्र कैसे हो सकता है। धारा को कल की चिंता नहीं थी। वह आज जीती थी। और शायद यही वजह थी कि लोग उसे पसंद करते थे। लेकिन निरव की पसंद की वजह कुछ और थी।

उसे धारा की बातें नहीं...
धारा की मौजूदगी पसंद आने लगी थी।


       शुरुआत में निरव को लगता था कि धारा बस उसकी बस-यात्रा का हिस्सा है। जैसे रोज़ दिखने वाला कोई पेड़, कोई दुकान या कोई परिचित चेहरा। लेकिन कुछ महीनों बाद उसे एहसास हुआ कि वह गलती कर रहा था। धारा अब उसके दिन का हिस्सा बन चुकी थी। फर्क बस इतना था कि यह बात धारा को शायद कभी समझ नहीं आई और निरव ने कभी बताई नहीं। बस नंबर 27 का सफ़र अब केवल सफ़र नहीं रह गया था। अगर किसी दिन धारा बस में नहीं आती, तो निरव का पूरा दिन अजीब-सा गुजरता। किताबें वही होतीं , क्लास वही होती , लोग वही होते , लेकिन सब कुछ जैसे थोड़ा कम लगने लगता। वह खुद पर चिढ़ता भी था। उसे समझ नहीं आता था कि एक इंसान की अनुपस्थिति इतनी बड़ी क्यों लगने लगी है।
धारा वैसे ही थी जैसी पहले दिन थी। बेफिक्र , बिंदास और बिना सोचे बोलने वाली। कई बार वह ऐसी बातें कह जाती थी जिन्हें सुनकर निरव रातभर सोचता रहता ,और अगले दिन धारा को याद भी नहीं रहता कि उसने क्या कहा था।

एक बार बस में बैठे-बैठे धारा ने अचानक पूछा ,"तू शादी कैसी लड़की से करेगा?"

निरव ने चौंककर उसकी तरफ देखा।

"अचानक?"

"हाँ, अचानक। जल्दी जवाब दे।"

"पता नहीं।"

"झूठा।"

"सचमे नहीं पता।"

धारा कुछ देर उसे घूरती रही। फिर बोली ,  
"मुझे लगता है तू उसी लड़की से शादी करेगा जो तुझे बोलने का मौका दे।" और वह खुद अपनी बात पर हँसने लगी।

निरव भी मुस्कुरा दिया , लेकिन उसने मन ही मन सोचा ,
"तो फिर तुझसे तो कभी नहीं।" और यही सोचकर उसका दिल हल्का-सा दुख भी गया। ऐसे ही छोटे-छोटे पल जमा होते गए। कभी दोनों कोचिंग के बाद चाय पीते। कभी किसी टेस्ट के खराब जाने पर घंटों बातें करते। कभी धारा किसी बेवकूफी भरी बात पर नाराज़ हो जाती और पाँच मिनट बाद खुद ही भूल जाती कि गुस्सा किस बात पर था। धारा का गुस्सा भी उसके स्वभाव जैसा ही था। तेज़ आता था और जल्दी चला जाता था।

लेकिन निरव?
वह हर बात दिल पर रख लेता था। एक दिन दोनों बस स्टॉप पर खड़े थे। बारिश हो रही थी। धारा छतरी लाना भूल गई थी , जैसा कि वह अक्सर करती थी। वह बारिश में भीगते हुए हँस रही थी।

"तुझे सर्दी हो जाएगी" , निरव ने कहा।

"तो हो जाने दे।"

"फिर दवा खानी पड़ेगी।"

"तो खा लूँगी।"

"फिर पैसे खर्च होंगे।"

धारा कुछ पल उसे देखती रही। फिर बोली ,"कसम से यार , तू बूढ़ा पैदा हुआ था क्या?"

निरव हँस पड़ा। और शायद यही वह पल था जब धारा ने पहली बार उसे खुलकर हँसते देखा। वह कुछ सेकंड तक उसे देखती रही।
फिर बहुत धीरे से बोली , 
"ऐसे हँसा कर कभी-कभी। अच्छा लगता है तु मूझे।"

धारा ने शायद यूँ ही कहा था। लेकिन उस रात निरव देर तक सो नहीं पाया। उसे बार-बार वही वाक्य याद आता रहा। 
"अच्छा लगता है तु मूझे..."

धारा को याद भी नहीं होगा कि उसने क्या कहा था। लेकिन निरव को याद था। और रहेगा भी। समय आगे बढ़ता गया। 

एक साल गुजर गया।

फिर डेढ़ साल।

अब दोनों के बीच वह झिझक नहीं रही थी जो शुरुआत में थी। धारा उसके नोट्स बिना पूछे उठा लेती। उसका टिफिन बिना अनुमति के खा लेती। और अगर निरव किसी दिन उदास होता , तो सबसे पहले उसे ही पता चल जाता।

एक बार धारा ने अचानक पूछा , "तू मुझसे कुछ छुपाता है क्या?"

"नहीं।" निरव का दिल एक पल को रुक गया।

"पक्का?"

"हाँ।"

धारा ने उसकी आँखों में देखा। काफी देर तक। फिर बोली , 

"झूठा एक नंबर का।"

और बात बदल दी। लेकिन उस दिन पहली बार निरव को लगा कि शायद धारा समझती है। शायद उसे अंदाज़ा है। शायद वह जानती है कि दोस्ती से थोड़ा ज़्यादा कुछ है। लेकिन वह भी कुछ नहीं कहती थी। और निरव भी नहीं। दोनों के बीच जैसे एक अनकहा सच था , जिसे दोनों जानते थे, लेकिन कोई छूना नहीं चाहता था। फिर एक दिन सब बदल गया। 

उस दिन धारा बस में नहीं आई। न अगले दिन। न उसके अगले दिन।
तीन दिन बाद जब वह वापस आई , तो वह वैसी नहीं थी। उसकी आवाज़ में वही चंचलता थी , लेकिन आँखों में थकान थी।

निरव ने पूछा भी नहीं। वह इंतज़ार करता रहा कि धारा खुद बताए। और आखिरकार उसने बताया। कोचिंग खत्म होने के बाद दोनों चाय की दुकान पर बैठे थे। धारा काफी देर तक चुप रही। शायद महीनों में पहली बार। फिर उसने धीरे से कहा,

"पापा को कैंसर है।" निरव का हाथ वहीं रुक गया। कुछ सेकंड तक वह कुछ बोल ही नहीं पाया। धारा सामने देखती रही। "डॉक्टर कह रहे हैं कि इलाज चलेगा... लेकिन..." वह वाक्य पूरा नहीं कर पाई।

पहली बार निरव ने उसकी आँखों में डर देखा। वह लड़की जो हर बात पर हँस देती थी। जो हर मुश्किल को मज़ाक में उड़ा देती थी। आज डरी हुई थी। निरव ने धीरे से कहा,

"सब ठीक होगा।" धारा मुस्कुरा दी। लेकिन वह मुस्कान नकली थी।
दोनों जानते थे। उस दिन घर लौटते समय बस में पहली बार दोनों चुप थे। और निरव को पहली बार महसूस हुआ कि कुछ कहानियों में दुख अचानक नहीं आता। वह धीरे-धीरे चलकर आता है। और जब तक हम उसे पहचानते हैं...वह हमारे सामने खड़ा होता है। 


                                     ★★★


 
    उस दिन के बाद बहुत कुछ बदल गया , लेकिन बाहर से देखने पर शायद कुछ भी नहीं बदला था। बस नंबर 27 अब भी उसी समय आती थी। धारा अब भी उसी सीट पर बैठती थी। कोचिंग अब भी चल रही थी। चाय की दुकान वाला अब भी उन्हें देखकर बिना पूछे दो चाय बना देता था। लेकिन अब धारा की हँसी में कहीं न कहीं एक थकान छिपी रहती थी। निरव ने यह सबसे पहले नोटिस किया। वह पहले जैसी ही बातें करती थी। कभी किसी सर की नकल उतारती, कभी किसी पड़ोसी की कहानी सुनाती , कभी किसी बेवकूफी भरे मीम पर पाँच मिनट तक हँसती रहती। लेकिन इन सबके बीच कई बार उसकी आँखें अचानक कहीं खो जातीं। और फिर अगले ही पल वह खुद को संभाल लेती। जैसे कुछ हुआ ही न हो। निरव उससे पूछना चाहता था कि वह ठीक है या नहीं। लेकिन उसे हमेशा लगता कि यह सवाल बहुत छोटा है। क्योंकि कभी-कभी इंसान ठीक नहीं होता। और यह बात दोनों जानते हैं। कुछ महीनों तक इलाज चलता रहा। धारा कभी अस्पताल जाती , कभी घर के काम संभालती , कभी कोचिंग आती। कई बार तो निरव को हैरानी होती थी कि वह इतनी सारी चीज़ें एक साथ कैसे संभाल रही है। लेकिन फिर उसे याद आता धारा बाहर से जितनी बेफिक्र दिखती थी , अंदर से उतनी ही मज़बूत थी।

    एक शाम दोनों बस स्टॉप पर खड़े थे। सूरज ढल रहा था। लोग अपने-अपने घर लौट रहे थे। और धारा अचानक बोली , 

"तुझे पता है, पापा को मेरी शादी की चिंता लगी रहती है।"

निरव ने उसकी तरफ देखा। उसने सामान्य दिखने की कोशिश की।

"हर पिता को होती है।"

"हम्म..."

धारा कुछ पल चुप रही। फिर बोली ,

"कभी-कभी लगता है कि उन्हें बस यही डर है कि उनके बाद मेरा क्या होगा।"

     निरव के पास कोई जवाब नहीं था। क्योंकि कुछ डर ऐसे होते हैं जिनका कोई तर्क नहीं होता। बस प्रेम होता है। और प्रेम अक्सर तर्क से बड़ा होता है। उस रात निरव बहुत देर तक सो नहीं पाया। पहली बार उसके मन में एक डर आया था। बहुत छोटा , बहुत हल्का। लेकिन इतना खतरनाक कि उसने उसे पूरी रात जगाए रखा। समय गुजरता गया।‌ और फिर एक दिन वह हुआ जिससे निरव डर रहा था।

धारा ने उसे फोन किया। उसकी आवाज़ सामान्य थी। इतनी सामान्य कि निरव को लगा शायद वह किसी टेस्ट के बारे में बात करेगी। लेकिन धारा ने कहा ,

"शाम को मिल सकता है?"

"हाँ।"

"ज़रूरी बात करनी है आजा।" बस इतना बोलकर फोन कट गया।

शाम को दोनों चाय की उसी दुकान पर मिले जहाँ पिछले दो सालों में न जाने कितनी बातें हुई थीं। धारा कुछ देर तक कप में चाय घुमाती रही। फिर बोली ,

"घरवालों ने मेरा रिश्ता तय कर दिया है।" 

दुनिया शायद उसी गति से चलती रही होगी। सड़क पर गाड़ियाँ चल रही होंगी। लोग बातें कर रहे होंगे। किसी ने कहीं हँसा भी होगा। लेकिन निरव के भीतर कुछ रुक गया। 

पूरी तरह।

उसने धारा को देखा। वह उसकी तरफ नहीं देख रही थी। 

"अगले महीने सगाई है।"

निरव ने होंठ खोले। लेकिन आवाज़ नहीं निकली।

"कुछ बोलेगा?"

    धारा ने पहली बार उसकी तरफ देखा। और शायद पहली बार दोनों ने एक-दूसरे की आँखों में वह सच देखा जिसे दो साल से कोई नाम नहीं दिया गया था। 

निरव कह सकता था। 
यही मौका था। 
शायद आख़िरी मौका।

वह कह सकता था , 
"मत जा।" 
"मैं तुझसे प्यार करता हूँ।" 
"मैं तेरे बिना नहीं रह पाऊँगा।"

लेकिन उसने कुछ नहीं कहा। बस बैठा रहा। चुप। जैसे हमेशा रहता था। धारा की आँखों में एक पल के लिए निराशा चमकी। बहुत हल्की। इतनी हल्की कि कोई और शायद देख भी न पाता। लेकिन निरव ने देख ली। और यही बात उसे जीवन भर याद रहने वाली थी। क्योंकि उस दिन उसने सिर्फ़ धारा को नहीं खोया था। उसने अपनी हिम्मत भी खो दी थी।

अगले कुछ हफ्ते धुंध की तरह बीते। धारा पहले जैसी दिखने की कोशिश करती रही। लेकिन अब दोनों के बीच कुछ बदल चुका था। बातें होती थीं। हँसी भी होती थी। लेकिन दोनों जानते थे कि समय खत्म हो रहा है।

एक दिन बस में धारा ने अचानक कहा,

"अगर मेरी शादी हो जाए तो रोएगा तो नहीं?"

और फिर खुद ही हँसने लगी। जैसे यह कोई मज़ाक हो। निरव भी मुस्कुराया। लेकिन उस रात तकिए का एक हिस्सा आँसुओं से भीग गया। शादी का कार्ड उसे एक हफ्ते पहले मिला।

सफेद लिफाफा।
सुनहरे अक्षर।
धारा का नाम।
किसी और के नाम के साथ।

निरव ने कार्ड कई मिनट तक देखा। फिर उसे बंद कर दिया। फिर खोला। फिर बंद किया। जैसे कार्ड नहीं कोई ज़ख्म हो जिसे वह छूना भी चाहता हो और नहीं भी। शादी वाले दिन वह नहीं गया। उसमें इतनी ताकत नहीं थी। शाम को वह अपने कमरे में अकेला बैठा रहा। घड़ी देखता रहा।

बार-बार।
सात बजे।
आठ बजे।
नौ बजे।
और हर बार उसके मन में एक ही ख्याल आता , 
"अब शायद फेरे हो रहे होंगे..."
"अब शायद विदाई हो रही होगी..."
"अब शायद वह रो रही होगी..."
और फिर...
वह खुद रो पड़ा।
इतना कि उसे साँस लेने में तकलीफ़ होने लगी।
क्योंकि कुछ लोग हमारी ज़िंदगी से जाते नहीं।
हमारे भीतर से निकलते हैं।
और वह प्रक्रिया बहुत दर्द देती है। 


     धारा की शादी के बाद पहले कुछ दिनों तक निरव को ऐसा लगता रहा जैसे वह किसी अजीब सपने में जी रहा हो। सुबह उठता ,कुछ पल के लिए सब सामान्य लगता , और फिर अचानक याद आता कि अब धारा किसी और की पत्नी है।‌ उसके बाद पूरा दिन किसी अधूरे वाक्य की तरह गुजरता। बस नंबर 27 अब भी उसी समय आती थी। लोग वही थे। रास्ते वही थे। लेकिन एक सीट खाली थी। और कभी-कभी एक खाली सीट पूरे सफ़र से बड़ी हो जाती है। शुरू-शुरू में निरव फिर भी उसी सीट पर बैठता था। शायद आदत से। शायद उम्मीद से। शायद खुद को तकलीफ़ देने के लिए। उसे खुद नहीं पता था। लेकिन हर सुबह जब बस किसी स्टॉप पर रुकती , तो एक पल के लिए उसकी नज़र दरवाज़े की तरफ उठ जाती। फिर अगले ही पल उसे याद आता अब कोई नहीं आने वाला। और वह वापस खिड़की के बाहर देखने लगता। 

    धारा की शादी को लगभग एक महीना हो चुका था जब उसका फोन आया। उस शाम निरव अपने कमरे में बैठा पढ़ने की कोशिश कर रहा था। किताब खुली हुई थी। लेकिन पिछले बीस मिनट से वह एक ही लाइन पढ़ रहा था। तभी फोन बजा। स्क्रीन पर नाम देखकर उसका दिल एक पल के लिए रुक गया।

धारा। उसने कॉल उठाई।

"हैलो।" उधर से वही आवाज़ आई। 
वही पुरानी। वही बेतकल्लुफ़।

"जिंदा है बे?"

निरव की आँखें बंद हो गईं।‌कितनी बार उसने यह वाक्य सुना था।
सैकड़ों बार। लेकिन आज यह अलग लगा। बहुत अलग।

"हाँ।"

"बस 'हाँ'?"

"और क्या बोलूँ?"

"अरे वाह। शादी मेरी हुई है , मिज़ाज तेरे बदल गए।"

वह हँस रही थी , निरव नहीं। कुछ सेकंड चुप्पी रही।

फिर धारा बोली , "कैसा है?"

"ठीक हुं।"

"पढ़ाई?"

"चल रही है।"

"निरव तू पहले से भी ज़्यादा बोरिंग हो गया है।"

     निरव ने कोई जवाब नहीं दिया। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह कैसे बात करे। दोस्त की तरह? या उस इंसान की तरह जिसने उसे खो दिया था?

उसकी आवाज़ में जो दर्द था , धारा उसे सुन पा रही थी। और शायद इसी बात ने उसे परेशान कर दिया।

"क्या हुआ है तुझे?"

"कुछ नहीं।"

"झूठ मत बोल।"

"सच कह रहा हूँ।"

"निरव!" पहली बार उसकी आवाज़ तेज़ हुई।

"मैं पिछले दस मिनट से बात करने की कोशिश कर रही हूँ और तू ऐसे जवाब दे रहा है जैसे किसी ने तुझे मजबूर किया हो।"

निरव चुप रहा। उसकी चुप्पी हमेशा से उसकी ढाल थी। लेकिन आज वही उसकी सबसे बड़ी गलती बन रही थी। धारा का गुस्सा बढ़ गया।

"ठीक है। अगर बात नहीं करनी तो मत कर।"

"धारा..."

"नहीं। रहने दे।"

"मेरी बात सुन"

"दो साल तक मेरी हर बात सुनता था। आज मेरी बात सुनने का मन नहीं है?"

निरव के भीतर महीनों से दबा हुआ दर्द अचानक बाहर आ गया।

"क्योंकि पहले सब अलग था!"

फोन के दूसरी तरफ़ अचानक सन्नाटा छा गया। दोनों कुछ सेकंड तक कुछ नहीं बोले। फिर धारा बहुत धीरे से बोली‌ ,

"अलग क्या था, निरव?"
उसके पास जवाब था। बहुत बड़ा जवाब। दो साल का जवाब। लेकिन वह फिर नहीं बोल पाया। फिर वही चुप्पी। वही डर। वही अधूरापन। धारा ने एक लंबी साँस ली।

"ठीक है।"
बस इतना। और कॉल कट गई। उस रात निरव को नींद नहीं आई। उसने शायद पहली बार महसूस किया कि कुछ रिश्ते एक झगड़े से नहीं टूटते। वे उन बातों से टूटते हैं जो कभी कही ही नहीं गईं। अगले दिन उसने कई बार सोचा कि धारा को फोन करे। माफ़ी माँगे। कुछ समझाए। लेकिन उसने नहीं किया। और धारा ने भी नहीं। यही उनकी आख़िरी बातचीत थी। समय किसी का इंतज़ार नहीं करता। धीरे-धीरे महीने सालों में बदल गए। निरव ने पढ़ाई जारी रखी। परीक्षाएँ दीं। असफल हुआ। फिर दीं। कुछ में सफल हुआ। कुछ में नहीं। ज़िंदगी आगे बढ़ती रही। लेकिन धारा का नाम उसके भीतर कहीं अटका रहा। किसी पुराने गीत की तरह। जिसे सुने हुए बहुत समय हो गया हो, लेकिन जिसके बोल अब भी याद हों। वह धारा को ढूँढता नहीं था। उसके प्रोफ़ाइल नहीं देखता था।
उसे मैसेज नहीं भेजता था। लेकिन कभी-कभी किसी पुराने दोस्त से पता चल जाता , 

धारा ठीक है। धारा दूसरे शहर में है। धारा खुश है।

और हर बार यह सुनकर उसे राहत मिलती। और दर्द भी। चार साल बीत गए। चार पूरे साल। लेकिन कुछ यादें कैलेंडर नहीं देखतीं। वे वहीं रहती हैं जहाँ हमने उन्हें छोड़ा था। और शायद इसी वजह से...
जब उस साल शहर में वार्षिक मेला लगा , तो निरव को बिल्कुल अंदाज़ा नहीं था कि उसकी ज़िंदगी का सबसे शांत और सबसे दर्दनाक दिन उसका इंतज़ार कर रहा है। 


चार साल बाद।
सुनने में यह एक छोटा-सा समय लगता है। लेकिन निरव जानता था कि चार साल कितने लंबे होते हैं। चार सालों में शहर बदल सकते हैं।
लोग बदल सकते हैं। चेहरे बदल सकते हैं। लेकिन कुछ यादें...वे वहीं रह जाती हैं जहाँ उन्हें आख़िरी बार छोड़ा गया था। धारा भी ऐसी ही एक याद बन चुकी थी। वह अब निरव की ज़िंदगी का हिस्सा नहीं थी। लेकिन उसकी यादें थीं। और शायद यही वजह थी कि चार साल बाद भी कभी-कभी सुबह की चाय के साथ उसका नाम याद आ जाता था। या किसी बस की खिड़की देखकर। या किसी लड़की की बेवजह हँसी सुनकर। 


    उस शाम शहर में वार्षिक मेला लगा हुआ था। चारों तरफ़ रोशनी थी। झूले घूम रहे थे। बच्चे भाग रहे थे। दुकानदार आवाज़ें लगा रहे थे। लाउडस्पीकर पर कोई पुराना फ़िल्मी गाना बज रहा था। निरव अपने एक दोस्त के कहने पर वहाँ आया था। वरना मेले जैसी जगहों से उसका कभी कोई खास रिश्ता नहीं रहा। भीड़ उसे हमेशा थका देती थी। लेकिन उस दिन वह भीड़ में बिना किसी मकसद के चल रहा था। जैसे लोग चलते हैं। बस चलते रहते हैं। फिर अचानक उसके कदम रुक गए। भीड़ वही थी। शोर वही था। मेला वही था। लेकिन उसके लिए दुनिया एक पल को शांत हो गई।

क्योंकि सामने...
करीब तीस कदम दूर...
धारा खड़ी थी।
पहले तो उसे यकीन ही नहीं हुआ।
उसने दोबारा देखा।
फिर तीसरी बार‌ और तब समझ आया कि वह सचमुच धारा ही थी।

चार साल बाद। उसकी आँखों के सामने। समय ने उसके चेहरे को थोड़ा बदल दिया था। पर उतना नहीं कि वह पहचान में न आए। उसकी मुस्कान अब भी वही थी। बस पहले से थोड़ी शांत। थोड़ी परिपक्व। थोड़ी थकी हुई। जैसी अक्सर ज़िम्मेदारियों के साथ हो जाती है। धारा किसी से बात कर रही थी।

और फिर...
उसने पलटकर देखा।
सीधे निरव की तरफ़।
दोनों की नज़रें मिलीं।
और अगले कुछ सेकंडों में चार साल एक साथ लौट आए।
बस नंबर 27।
वह खिड़की वाली सीट।
चाय की दुकान।
बारिश।
कोचिंग।
वह फोन कॉल।
वह झगड़ा।
सब कुछ।
एक साथ।
धारा ने उसे पहचान लिया था।
इसमें कोई शक नहीं था।

   उसकी आँखों में वही हल्की-सी हैरानी थी जो शायद इस मुलाक़ात के लिए दोनों तैयार नहीं थे। निरव वहीं खड़ा रहा। वह आगे बढ़ सकता था। उससे बात कर सकता था। पूछ सकता था कि कैसी हो।
ज़िंदगी कैसी चल रही है। लेकिन उसने कुछ नहीं किया। क्योंकि कभी-कभी चार साल की चुप्पी को एक "कैसी हो?" में समेटना मुश्किल होता है।

और तभी...
धारा झुकी। उसने अपने पास खड़े एक छोटे बच्चे को गोद में उठा लिया।
शायद तीन साल का होगा। गोल-मटोल चेहरा। बड़ी-बड़ी आँखें। हाथ में रंगीन गुब्बारा। बच्चे ने कुछ पूछा।

   धारा हँसी। वही पुरानी हँसी। बस अब उसमें माँ होने की गर्माहट भी शामिल थी। निरव उसे देखता रहा।और पहली बार...उसे अपने भीतर कुछ बदलता हुआ महसूस हुआ।क्योंकि उस पल उसने धारा को नहीं देखा। उसने उसकी दुनिया को देखा। उस ज़िंदगी को देखा जो उसके बिना आगे बढ़ चुकी थी।

   धारा ने बच्चे को थोड़ा ऊपर उठाया। बच्चा हँसने लगा। और उसी क्षण धारा की नज़र फिर निरव से मिली। कोई शब्द नहीं थे। कोई इशारा नहीं था। कोई मुस्कान भी नहीं। बस आँखें और उन आँखों में चार साल की दूरी थी। लेकिन न जाने क्यों? निरव को लगा जैसे धारा कुछ कह रही हो। वही धारा जो हमेशा बिना सोचे बोल देती थी। आज बिना बोले बहुत कुछ कह रही थी। उसे लगा जैसे वह कह रही हों , 

"देख..."
"ज़िंदगी यहीं तक नहीं रुकी थी।"
"मैं आगे बढ़ गई।"
"और तू भी बढ़ सकता है।"

भरे मेले में निरव की आँखें भर आईं। लेकिन इस बार दर्द अलग था।
यह वह दर्द नहीं था जो शादी वाले दिन था। यह वह दर्द नहीं था जो उस आख़िरी फोन कॉल के बाद था। यह एक लंबे सफ़र की थकान थी।एक ऐसे इंसान की थकान जिसने चार साल तक एक दरवाज़ा बंद करने की कोशिश की थी। और आज पहली बार उसे समझ आया था कि दरवाज़ा बंद करने की ज़रूरत ही नहीं है। बस आगे बढ़ने की ज़रूरत है।

धारा ने बच्चे का हाथ पकड़ा।
फिर वह भीड़ में आगे बढ़ गई।
धीरे-धीरे।
बिना पीछे देखे।
और इस बार...
निरव ने भी उसे नहीं रोका।

क्योंकि कुछ लोगों को रोकना नहीं चाहिए। कुछ लोग हमारे जीवन में रहने के लिए नहीं आते। वे हमें बदलने के लिए आते हैं। और फिर चले जाते हैं। 

भीड़ में धारा धीरे-धीरे ओझल हो गई। 
पहले उसका चेहरा गायब हुआ। 
फिर उसकी साड़ी का रंग। 
फिर वह छोटा-सा गुब्बारा।
और फिर...
कुछ भी नहीं।

निरव काफी देर तक वहीं खड़ा रहा। मेला अब भी चल रहा था। शोर अब भी था। झूले अब भी घूम रहे थे। लेकिन उसके भीतर एक अजीब-सी शांति उतर आई थी। उस रात जब वह घर लौटा तो बहुत दिनों बाद उसने अपना पुराना बक्सा खोला। वही बक्सा जिसमें कुछ पुरानी तस्वीरें , कुछ नोट्स और धारा की लिखी हुई दो-तीन छोटी पर्चियाँ रखी थीं। उसने उन्हें निकाला। ध्यान से देखा। मुस्कुराया। और फिर वापस रख दिया।

पहली बार उसने उन्हें सीने से लगाकर रोने की कोशिश नहीं की। पहली बार उसने किसी याद को बचाने की कोशिश नहीं की। क्योंकि अब उसे समझ आ गया था यादों को पकड़े रखने से लोग वापस नहीं आते। लेकिन यादों को सम्मान देकर आगे बढ़ा जा सकता है। उस रात खिड़की के बाहर हल्की हवा चल रही थी। 

निरव बिस्तर पर लेटा और वर्षों बाद...धारा को याद करके नहीं रोया।उसने बस आँखें बंद कीं और मन ही मन कहां 

"तू जहाँ भी है..."
"खुश रहना, धारा।"

फिर वह मुस्कुराया।
बहुत हल्का।
बहुत सच्चा।
और शायद चार साल में पहली बार...
उसे नींद आने लगी।


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