भेड़चाल।
भेड़चाल।
वह अपने दुबले पतले शरीर के साथ आगे बढ़ता ही जा रहा था कि तभी पीछे से आवाज़ आई-सुघोष। उसने पीछे मुड़कर देखा लेकिन वह रुका ही नहीं।उसे लग रहा था कि वह पीछे मुड़कर देखेगा और वही पहुँच जायेगा जहाँ से बचकर निकल आया था।
सुबह सुघोष की नींद खुली तो उसे आभास हुआ कि वह एक सपना देख रहा था। अब उसके सिर दर्द की वजह थी उसके परिवार की उम्मीदें जो उसे भेड़चाल चलने को मजबूर कर रही थी। उसने काफी कोशिश की अपने परिवार की उम्मीदों पर चलने की लेकिन वह चाहकर भी उनकी उम्मीदों को पूरा नहीं कर सका।
सुघोष के माता पिता एक ग़रीब परिवार से ताल्लुक रखते थे जहाँ मेहनत मजदूरी करके सुघोष के पिता का लालन पालन हुआ। सुघोष के दादाजी ने मेहनत मजदूरी करके सुघोष के पिता को पढ़ा लिखा कर एक काबिल अफसर बनाया। सुघोष के पिता की उनके क्षेत्र में एक अच्छी साख थी लेकिन वह इतने में सन्तुष्ट नहीं थे। उन्हें लगता था कि उन्हें उनकी काबिलियत के अनुसार सफलता नहीं मिली और इसी कारण से वह अपने जीवन में कभी भी खुश नहीं रह पाये।
सुघोष के जन्म के बाद उनकी सोई हुई उम्मीद फिर से जाग उठी थी और उन्हें लगा था कि जो ख्याति उन्हें नहीं मिली, वह उनका बेटा प्राप्त करेगा।
धीरे धीरे समय बीत रहा था सुघोष के जीवन का। रियलिटी शो की बढ़ती हुई प्रसिद्धि के कारण सुघोष के पिता चाहते थे कि वह एक गायक कलाकार बने जबकि सुघोष की रुचि विज्ञान की ओर बढ़ रही थी।
इसी बात को लेकर आए दिन दोनों के बीच तनाव रहने लगा। सुघोष चाहता था कि उसके पिता उसकी इच्छा का सम्मान करते हुए उसे आगे बढ़ाए लेकिन उसके पिता कुछ समझने को तैयार नहीं हुए। हार कर सुघोष ने अपने घर से अलग होने का निर्णय लिया और वह एक किराये के कमरे में रहने लगा। उसने एक विज्ञान शोधशाला में नौकरी कर ली जहाँ पर उसने काफी कुछ सीखा।
बाद में उसने अपने शोध कार्य शुरू किए जिसमें उसे सफलता प्राप्त हुई जिससे उसकी ख्याति विश्व भर में फैल गई। अब उसके पिता को भी लग रहा था कि अगर समय रहते सुघोष ने अपना रास्ता नहीं चुना होता तो शायद वह भी इस भेड़चाल में खो गया होता। अब जाकर उन्होंने माना कि इंसान को अपनी योग्यता को अपनी रूचि में विकसित करना चाहिए ना ही भेड़ चाल का हिस्सा बन अपना अस्तित्व खो देना चाहिए।
