बड़ी बहू
बड़ी बहू
उन दिनों राकेश सिंह अपने इकलौते बेटे के पास पत्नी सहित पहली बार मुम्बई गए हुए थे। बेटा बहु के आदर सत्कार और पोता पोती की बाल सुलभ लीलाओं में बंधे उन्हें पता ही नहीं चला कि कैसे दो महीने बीत गए।
राकेश सिंह और सुरेश सिंह दोनों सहोदर भाईयों के पास पैसा तो बहुत नहीं था लेकिन बिहार के उस सुखी सम्पन्न गांव में उन्होंने इज्जत बहुत कमाई थी। संयुक्त खाते में नहर के पास बीस बीघा उपजाऊ जमीन थी जिससे साल भर तक पूरे परिवार की सभी आवश्यकताओं की पूर्ति हो जाती। उनके खेत में उपजे सोना चूर चावल की चर्चा अपने स्वाद और खुशबू के चलते दूर दूर तक फैली हुई थी। उसकी बिक्री से उनका घर भर जाता।
राकेश सिंह बड़े होने के कारण परिवार के मुखिया थे। गांव से दस कोस दूर जिला मुख्यालय में वे किसी नामी गिरामी वकील के ताईद थे। अपने भाई सुरेश सिंह की तरह वे भी ज़्यादा पढ़े लिखे तो नहीं थे लेकिन उनकी तार्किक बुद्धि और व्यवहारिक ज्ञान का लोहा दस गांवों के पंचायत के मुखिया और सरपंच भी मानते थे और गांव के न्यायिक और विकास कार्य उनकी सहमति से ही करते।
छोटे भाई सुरेश सिंह के दो लड़कियां और दो बेटे थे। बड़ा बेटा ज्यादा पढ़ लिख नहीं सका था , वह पिता के साथ पूरी लगन और मेहनत से खेती करता। छोटा अजय पढ़ने में तेज था और अभी दसवीं में पढ़ रहा था। राकेश सिंह के कुशल नेतृत्व में पूरा संयुक्त परिवार एक स्नेह की डोर से बंधा हुआ था।
संयुक्त परिवार की आय से ही राकेश सिंह ने अपने एकलौते बेटे को इंजीनियर बनाया था ओर दोनों भतीजियों की शादी सुखी सम्पन्न परिवार में की थी। लेकिन मुम्बई में कार्यरत उनका बेटा अभय सिंह जब भी गांव आता पिता से कहता,
" पापा, धीरे धीरे यहां का सब जंजाल हटाईये और मेरे साथ चलकर मुम्बई रहिए, एक नया डुप्लेक्स हाउस ले रहा हूं उसी के लिए पैसों की जरूरत है।"
तीसरी बार जब अभय सिंह ने गांव की जमीन बेचने की पेशकश की तो सुरेश सिंह और उनके बेटों ने तो कुछ नहीं कहा लेकिन राकेश सिंह ने ही आपत्ति उठाई।
" बेटा जमीन बेचना मुझे न्याय संगत नहीं लगता है। तुम्हारे दोनों छोटे भाई और काका खेती पर ही आश्रित हैं।"
" लेकिन हमारा अपना हिस्सा दस बीघा होता है उसे तो बेच सकते हैं बाबू जी।"
" किस हिस्से की बात कर रहे हो। हिस्सा बराबर का चाहिए तो हमें भी अपनी नौकरी से हुई आमदनी को जोड़कर हिस्सा बांटना पड़ेगा। हमलोग ऐश करें और वे लोग गरीबी में दिन गुजारें मेरे जीते-जी ऐसा नहीं होगा।" कहकर उन्होंने बात समाप्त कर दी।
अभय सिंह की शादी पास के गांव के दबंग भूतपूर्व जमींदार प्रदुम्न सिंह की बेटी से हुई थी। उन्होंने दामाद से सारा किस्सा सुना तो उनका खुराफाती दिमाग तिकड़म भिड़ाने लगा।
राकेश सिंह के मुंबई रहते मौका पाकर अभय सिंह टूर पर जाने का बहाना बनाकर गांव पहुंच गया।
" काका, पिता जी की हालत बहुत खराब है, उनके इलाज के लिए बहुत पैसों की जरूरत पड़ेगी इसलिए मैं अपने हिस्से की दस बीघा जमीन बेचना चाहता हूं।"
" बेटा इस समय हिस्सा बखरा की बात मत करो। तुम्हे जितने पैसे की जरूरत है उतने की जमीन बेच दो। और चलो मैं भी तुम्हारे साथ मुम्बई भैया की सेवा के लिए चलता हूं।" सुरेश सिंह का कलेजा भाई की बीमारी सुनकर फटा जा रहा था।
काका की सहमति मिलते ही उसने औने-पौने दाम पर अपने ससुर प्रद्युम्न सिंह के भतीजे के साथ जमीन का सौदा कर लिया।
आज रविवार था और कल सोमवार को जमीन की रजिस्ट्री होने वाली थी। प्रदुम्न सिंह अपने भतीजे के साथ आकर सुरेश सिंह के यहां ठहरे हुए थे और सारा परिवार उनकी खातिरदारी में लगा हुआ था। शाम के समय दरवाजे पर आकर एक टैक्सी रूकी और उसमें से उतरे राकेश सिंह अपनी पत्नी, बहु और पोते के साथ।
आप कैसे हैं भैया,आप कैसे हैं ताऊ जी कहते हुए सुरेश सिंह और उनके दोनों बेटे राकेश सिंह से लिपट कर रोने लगे थे और उनकी तीमारदारी में लग गये थे।
लेकिन इधर पत्नी के रूम में घुसते ही अभय सिंह ने ससुर के सामने ही आंख तरेरते हुए अपनी पत्नी से क्रोध में कहा,
" तुम बाबू जी को दो चार दिन और नहीं रोक नहीं सकती थीं मुम्बई में। सब प्लान चौपट कर दिया।"
" बाबूजी खुद नहीं आये हैं , मैं उन्हें सच्चाई बताकर अपने साथ लाई हूं। इतना बड़ा षड्यंत्र, मुझसे भी छुपाया आपने। मै यह अनर्थ नहीं होने दूंगी।"
" बेटी यह सब हमलोग तुम्हारी ही भलाई के लिए तो कर रहे हैं।" पिता ने बेटी को पुचकारते हुए कहा
" बाबा, आप तो कृपया चुप ही रहिए। बचपन से देखा है मैंने आपको। किसी की तरक्की और खुशहाली आप देख ही नहीं सकते। ना जाने कितनी ईर्ष्या, लोभ और दूसरों को नीचा दिखाने की ख्वाहिश भरी हुई है आपके भीतर।कम से कम अपनी बेटी का घर तो छोड़ देते।"
प्रद्युम्न सिंह हतप्रभ रह गए थे बेटी के व्यवहार से लेकिन संभलकर बोले,
" बेटी मुझे और अपने पति को समझने की कोशिश करो। मुंबई में तुम्हारा अपना डुप्लेक्स भवन होगा तो क्या तुम्हें खुशी नहीं होगी।"
" यदि सोना उगलती जमीन और काका जी और उनके बेटों के अरमानों की कीमत पर डुप्लेक्स होगा तो खुशी एकदम नहीं होगी।"
" बेटी तुझे इन सब बातों की अभी समझ नहीं है। तू बच्ची है अभी, तू चुप रह।"
" बाबा मैं चुप नहीं रहूंगी, मैं बच्ची भी नहीं हूं। मुझे विरासत में यदि आपसे दबंगई मिली है तो मां से मुझे दूसरों का दुख दर्द समझने और धर्म पर चलने की शिक्षा भी मिली है। जब घी चुपड़ी रोटियां अपने पूरे परिवार के साथ मिल बांटकर खाई जाती है तभी उसमें स्वाद आता है। सबसे बड़ी बहू होने के नाते मेरी भी संयुक्त परिवार में जिम्मेदारियां हैं और मैं उन्हें निभाने के लिए किसी हद तक जा सकती हूं। एक धूर जमीन भी नहीं बिकेगी, यह इस संयुक्त परिवार का आखिरी फैसला है।"
