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Junaid chaudhary Mj

Inspirational


3  

Junaid chaudhary Mj

Inspirational


बाबा

बाबा

12 mins 321 12 mins 321

दिन जुमेरात शहादत का महीना मोहर्रम से दो दिन पहले, मेरी ज़िंदगी का सबसे अहम हिस्सा, जिस से शुरू हुआ मेरी ज़िंदगी का किस्सा

मेरे बाबा

मुझे वो दिन कभी याद करने की ज़रूरत नहीं। क्योंकि जिसे भुलाया न जा सके वो कभी यादों का मोहताज नहीं होता। उस दिन मैं स्कूल से घर आने के लिए रवाना हुई। मेरे बाबा बीमारी से जूझ रहे थे। अस्पताल में वो अपनी ज़िंदगी के आखरी पल गुज़ार रहे थे। यू तो में बाबा से मिलने स्कूल से आकर जाया करती थी लेकिन उस दिन अजीब सा एहसास हुआ। मानो कोई मुझसे मेरी अज़ीज़ चीज़ छीन रहा हो।और में सीधे अस्पताल चली गयी। क़रीब एक घण्टा में बाबा के पास बैठी रही। फिर घर आने के लिए में उनके सिरहाने से उठ कर चलने के लिए तैयार होने लगी। मैं अभी खड़ी बाबा को निहार ही रही थी कि अम्मी के जान पहचान की दो औरते वहाँ आयी। अम्मी बाबा का हाथ थामे बैठी थी। शायद उन्हें आगाज़ हो रहा था। क्योंकि निकाह के बाद रूह से रूह का रिश्ता जुड़ जाता है। बाबा भी अम्मी का हाथ छोड़ने को तैयार नहीं थे। बाबा की तड़प ऐसी थी जो किसी से देखी नहीं जा रही थी। फिर उन दोनों औरतों ने नानी से कहा के अब इनका हाथ छुड़वा दीजिए। 


क्या मंज़र था...मैं छोटी थी, समझ नहीं पाई के वो ऐसा क्यों बोल रही हैं। अम्मी बाबा का ही तो हाथ पकड़े हुए है। किसी और का तो नहीं। लेकिन मेरी नानी समझ चुकी थी के वो ऐसा क्यों बोल रही हैं। नानी ने अम्मी का हाथ बाबा के हाथ से छुड़ा दिया। बाबा को खून की उल्टी हुई और उनकी ज़िन्दगी की किताब हमेशा के लिए बन्द हो गयी। और वो औरतें कहने लगी मोहर्रम का महीना मुँह से खून आकर शहादत हुई है। बस सुनते ही अम्मी ज़ारो कतार रोने लगीं। मैं समझ ही नहीं पाई के क्या हुआ। उस एहसास को कैसे बयां करूँ के अब हम यतीम हो चुके है । तमाम कोशिशों ओर दुआओ के बावजूद बाबा को बचा न सके। ज़िन्दगी का सबसे दर्दनाक हादसा जिसने हमारी ज़िंदगी बद से बदतर कर दी।

मेरी आँखों से वो मंज़र मिटायेगा कौन।

तसल्ली देने तो सब आयंगे साथ निभाने आयेगा कौन।

इन रोती आँखो को बाबा की तलाश है।

उन्हें लेकर भला आएगा कौन।

मेरी आँखों से वो मंज़र मिटायेगा कौन.....


हम बाबा को लेकर घर आ गए। मेरे छोटे बहन भाई जो आस लगाए बैठे थे की बाबा कब आयेंगे मानो उनकी आँखें पूछ रही हो की भेजा था बाबा को लाने। हमेशा के लिए ले जाने के लिये क्यों लाए। सबसे छोटा भाई तो इतना मासूम था कि उसे मालूम ही नहीं था बाबा का साया सिर से उठना क्या होता है।

ज़िन्दगी की तड़प वक़्त का इम्तेहान 

हम लोग बाबा को आखरी विदाई देकर आये।

बहन भाई अम्मी खुद को संभाल नहीं पा रहे थे।

चाह कर भी सब्र नहीं आ रहा था। सब गुमसुम बैठे थे। लेकिन किसी को हमारे दर्द से क्या फर्क पड़ना था। कुछ लोग सिर्फ खाने के लिए ही आये थे। मेरा छोटा भाई जो अभी सिर्फ 15 साल का था मुझसे गले लग कर रोने लगा। कहने लगा बाहर चाचा और रिश्तेदार खाने में बोटियों को लेकर तंज़ कस रहे है।कुछ आपस मे बातें बना रहे है। और कुछ एक दूसरे की प्लेट से बोटियां उठा कर खा लड़ रहे है। 

उसकी बातें सुन कर मेरी आँखों से आंसूओं की लड़िया बहनी शुरू हो गयी। मैं सोचने लगी ये लोग कैसे इंसान है। इनका दीन ईमान ज़मीर इंसानियत सब मर चुकी है। इनसे अच्छे तो जानवर है। एक कौवा मर जाये तो सारे कौवे चीख चीख कर पूरे मोहल्ले को बता देते है कि देखो हम में से कोई एक आज दुनिया से चला गया। और ये लोग खाने के ऊपर लड़ रहे है।

वाह रे दुनिया किसी का सब कुछ छीन गया

तुम्हें इकट्ठा मिल के हँसने का मौका मिल गया


खैर वो लोग जब खा लड़ कर थक गए तो झूठे बर्तन के साथ झूठे रिश्ते भी वही छोड़ गए। अब कुछ गिने चुने रिश्तेदारों के अलावा कोई हमारा हाल पूछने न आता। और हाल भी क्या पूछते के तुम्हें तुम्हारे बाबा याद आते हैं? मैं सोच में पड़ जाती के ये लोग कितना अजीब सवाल करते है। एक बेटी से पूछते है कि उसका बाप याद आता है कि नही। वो बेटी अपने बाप को कैसे भूल सकती है जो मौत के वक़्त बाप के सिरहाने बैठी हेंड फैन से हल्के हल्के हवा दे रही हो। कभी उनके माथे पर आने वाले बालों को उंगलियों से परे हटाती हो साथ मे कुछ पढ़ कर उसके चेहरे पर फूकती जाती हो। अपने बाबा की चुप चाप नज़रे देर तक खुद पर महसूस करती हो। कुछ पल बस कुछ पल के लिये ही वो घर जाने के लिए मुड़ी हो और पीछे से आवाज़ आये देखो बाबा को क्या हो रहा है। और उसके देखते ही देखते लरज़ते होठों से उसका बाप कलमा पढ़े। माँ चीख कर कहे कलमा पढ़ो। फटी फटी आंखों से वो कलमा पढ़े..और कलमा पढ़ते पढ़ते जिस्म का खून मुँह को आ जाये...  दर्द अपनी शिद्दत को हो ओर रूह पैरो की तरफ से जिस्म से निकलती महसूस हो। फिर कोई उसके बाबा की खुली रह जाने वाली आंखों को बंद कर दे। फिर डॉक्टर के तसदीकी अल्फाज़ो को सुन ने के बाद भी बाबा को बेयक़ीनी से देखे ओर सब्र टूट जाय।

इतने दिन गुज़रने के बाद भी वो मंज़र मेरे दिल को चीरता है। मैं खुद को कोसती हूँ के पीछे क्यो मुड़ी मैं। बाबा ने शायद आवाज़ दी हो। मैने क्यो नहीं सुना। एक बेटी से कभी न पूछो के उसका बाप याद आता है या नही। वो मुस्कुराती है खाती है पीती है, ज़िन्दगी गुज़ार रही है तो इसका ये मतलब नहीं है कि वो अपने बाप को भूल गयी है। यार बेटियां भी अपने बाप को भूल सकती है ? और बाप भी वो जो सरापा ए इश्क़ हो।जो बेटी अपने बाप को अपने सामने मरता देखे वो तो हरगिज़ नहीं भूल सकती।

मौत ने सिर्फ जिस्म को चुराया

रूह का साथ तो हमेशा रहेगा

लोगो को लगा हम भूल गए

ज़ालिम ज़माने से ज़रा सा दर्द क्या छुपाया

खुश नसीब होते है वो लोग जिनके अपने-अपने होते है। हमे तो किसी ने गले भी लगाया तो पीठ में ख़ंजर घोपने के लिये।

अभी बाबा को गए 40 दिन भी पूरे न हुए थे। हमारी आंखों के आँसू अभी ख़ुश्क भी न हुए थे कि ताया के लड़के जिस दादिलाई मकान में हम रहते थे उसे खाली कराने आ गए। सारे कसमे वादे रिश्ते नाते बाबा के साथ जा चुके थे। उन्हें डर था कि चाचा तो रहे नही। कहीं ये यतीम बच्चे घर पर कब्ज़ा न कर लें। 

अम्मी इद्दत में बैठी थी। बड़ी मान मनोव्वल ओर इलतेजाओ के बाद वो कुछ दिन की मोहलत देकर चले गए। इद्दत पूरी होते ही अम्मी ने कुछ जमा पैसों से लेडीज सूट्स का काम कर लिया।

तपती दोपहरों में बाबा का ग़म लिए वो घरों घरों जाती और सूट्स दिखाती। कभी कोई खरीद लेता तो कभी कोई इतने कम दाम लगा देता की अम्मी का हौसला ही हिल जाता। लेकिन वो फिर हिम्मत जुटाती क्योंकि वो जानती थी कि मांगी हुई मोहलत कभी भी खत्म हो सकती है। और इंसान के भेष में छुपे हैवान कभी भी हैवानियत पर उतर सकते है।


कुछ दिन गुज़रने के बाद वो फिर वापस आ गए। इस बार उनकी आंखों में ज़रा भी रहम न था। उन्होंने कुछ नहीं सोचा कि हमसे खून का रिश्ता है। बल्कि वो तो रिश्तों का खून करने के इरादे से आये थे। वैसे भी जो पैसों के लिए जीता हो वो रिश्तों की कद्र क्या करेगा। हमारे बाबा ने हमे बस मोहब्बत और अख़लाक़ ही विरासत में दिए थे। बाकी जो बचा था वो उनके इलाज ओर अम्मी की इद्दत में चला गया। पैसों की तंगी की वजह से भाई ने 10th के एग्जाम छोड़ दिये और कमाने के लिए दूसरे राज्य में चला गया। वक़्त बड़ा बेरहम है जो बच्चा स्कूल का बस्ता उठाने में नखरे दिखाता था आज वो घर की ज़िम्मेदारी कंधों पर लिए घर छोड़ गया। मैं बस बेबसी और आंसूओं भरी आंखों से उसे जाते देखती रही।

खैर ताया के लड़के ने समान उठा कर फेंकना शुरू कर दिया।

अब वक्त हमारी आज़माइश ले रहा था। ज़िन्दगी नया खेल-खेल रही थी। न राह थी न मंज़िल थी। न कोई ऐसा था जिस से आस लगाते। वो एक एक कर सामान फेंक रहे थे ओर बदतमीज़ी बोल रहे थे। और लोग खड़े हमारा तमाशा देख रहे थे।


लेकिन किसी ने सही कहा है जिसका कोई नहीं होता उसका ख़ुदा होता है। जहाँ सारे दरवाज़े बन्द होते है वहां वो अपनी रहमत के दरवाज़े खोल देता है। बस अल्लाह ने फरिश्ते के रूप में मेरी अम्मी के खालू हाजी साहब को भेज दिया। हाजी साहब रसूख वाले आदमी थे और बहुत धाकड़ थे। उनकी पंचायत का सुनाया फैसला कोई नहीं टालता था। जब उन्होंने देखा कि घर का सामान बाहर फिकवाया जा रहा है तो उनके अल्फ़ाज़ - चाहू तो इस सब समान की जगह तुम सब को बाहर फिकवा दूँ ओर ये घर इसके नाम करा दूँ। लेकिन मेरा ये कदम इस औरत की खुद्दारी को ठेस पहुंचायेगा। तुमने क्या सोचा इन बच्चों का कोई नहीं। फिर जब उन्होने हमारी तरफ नज़र की तो हम तीनों माँ बेटियों की आंखों में आँसू और बेबसी देख कर वो भी तड़प उठे। और उन्होंने अहद कर लिया कि अब इन बच्चों को जल्द अज़ जल्द अपना मकान मिलेगा। उन्होंने वहां से हमारा समान उठवाया ओर अपने घर ले आये।


मेरे ज़हन में घर छोड़ते वक़्त बस एक ही बात थी कि या रब एक घर जिसकी खुली छत हो.. और इज़्ज़त की रोटी हो... कोई बेइज़्ज़ती करने वाला न हो.. मिल जाए मोला।

अम्मी थी गरीब लेकिन खुद्दारी के मुआमले में बहुत अमीर थी। अपने खालू के घर रहना उन्हें अच्छा नहीं लगा। हाजी साहब ये बात जानते थे इसलिए तीसरे दिन ही उन्होंने अपने भाई का मकान हमे किराये पर दिलवा दिया। वो घर ऐसा था कि तीसरी मंज़िल थी। और पानी सबसे नीचे लगे हत्थी के नल से भर कर ले जाना पड़ता था। मैं और मेरी अम्मी नीचे से पानी भर कर जितनी सीढ़ियां चढ़ती बस यही ज़ुबा पर होता या रब मानती हूँ तू मेरी आज़माइश ले रहा है। लेकिन अब जहा भी हमारा अपना घर हो वहां हमे पानी की दिक्कत न हो।

ख़ुदा 70 माओ से ज़्यादा प्यार करता है।ओर दुआ करने वाला उसके सबसे करीब रहता है।


ख़ुदा का करिश्मा था कि अभी हमे इस किराये के घर मे रहते महज़ 26 दिन हुए थे कि हाजी साहब फिर आते हैं ओर कहते है मेरे साथ चलो एक घर दिखाता हूँ । हम घर देखने जाते है। अम्मी के खालू कहते है घर पसन्द आया ? 

मेरी माँ का जवाब जो आप अंदाजा लगा सकते है। उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा घर तो बहुत अच्छा है। पर मेरी हैसियत के मुताबिक नहीं है।आप ऐसा दिखा दीजिए जिसे में ले सकूँ।

मैं सोचने लगी कि अब हाजी साहब भी हमारी बेबसी का मज़ाक उड़ा रहे है।


इतने में वो बोले बस अपना सामान यहां ले आओ ये घर तुम्हारा। लेकिन मसला वही था कि दूध का जला छाज भी फूक कर पीता है। अम्मी घबराई हुई थी। इस घबराहट में कई रंग उनके चेहरे पर आ जा रहे थे। हाजी साहब ने कहा, अरे तुम जिस मकान को छोड़ कर आई हो उसके हिस्से के 1 लाख 20 हज़ार में ले आया हूँ उनसे। थोड़े बहुत जुड़े जंगड़े तुम्हारे पास पड़े हो तो मुझे दे दो। मैं इस घर मे किराये दार रखवा दूँगा। जो किराया आता जाए उसे तुम जमा कर के मुझे देते रहना। इस से तुम्हारी खुद्दारी भी बची रहेगी और काम भी हो जायेगा। 


उस वक़्त की मेरी खुशी को लफ़्ज़ों में बयां करना मुश्किल है। जहाँ हम सिर्फ सर छुपाने लायक़ ज़मीन से खुश हो जाते वह 65 गज़ का घर मिल जाना करिश्मे से कम न था। हम सब की दुआ क़ुबूल हो गयी। मैं ख़ुदा से अक्सर नमाज़ में कहा करती या ख़ुदा किराये का घर काटखाने को दौड़ता है। हर वक़्त बेइज़्ज़ती का डर लगा रहता है। या ख़ुदा अपना मकान करा देना। और आज अपना मकान हो गया। लेकिन पानी की दिक्कत हमे यहां भी रही। और यहां भी पानी सरकारी नल से भर कर लाना पड़ता। लेकिन फिर भी ज़िन्दगी ने धीरे-धीरे ख़ूबसूरत मोड़ लेना शुरू कर दिया। भाई काम सीख कर अपने शौक मार कर घर पैसा भेजने लगा। घर की उधारी धीरे धीरे जमा कर हमने रजिस्ट्री अपने नाम करा ली। 

पर ज़ालिम दुनिया अपने ज़ुल्म से कहां बाज़ आती है।

जो कमज़ोर होता है उसे ज़्यादा दबाया जाता है।औ र ये तजुर्बा हमें हमारे पड़ोसियों ने दिया। किसी ने भी हमे लाइट नहीं दी। रमज़ान का महीना शदीद गर्मियों के दिन रोज़े की हालत में दिन तो जैसे तैसे कट जाता। लेकिन अंधेरे में इफ्तार के बाद लेटने का मन करता तो गर्मी बुरा हाल कर देती। मैं कभी कभी इफ्तार के बाद आसमान की तरफ मुँह कर के कहती बाबा आप होते तो ये सब मुसीबतें न होती।आप क्यों हमे तन्हा ज़ालिमों के बीच मे छोड़ गए बाबा।आप तो जानते है बाबा में आपकी बहादुर बच्ची हूँ। इतनी जल्दी हार नहीं मान ने वाली। मैं टूटना नहीं चाहती लेकिन ये हालात तोड़े बिना रुकना नहीं चाहते बाबा। जब आपकी ज़्यादा याद आती है तो। मैं आपकी आखरी निशानी आपका बटुआ देख लेती हूं। इतनी तंगी के बावजूद भी मैंने उन पैसों को कभी खर्च करने का नहीं सोचा बाबा।


इधर मेरी माँ चाहती तो हाजी साहब से कह कर लाइट वग़ैरा का कनेक्शन करा सकती थी। लेकिन उनकी गैरत उन्हें कुछ कहने न देती। लेकिन हाजी साहब भी अजीब नजूमी थे। जिन्हें न जाने कब कैसे हमारी परेशानियों का पता लग जाता और झट से आ जाते। जब उन्होंने आकर देखा कि पानी सरकारी नल से लाना पड़ रहा है रोज़े में ... ओर इफ्तार अंधेरे में हो रही है। तो पहले अम्मी को डांटा और कहा की कोई परेशानी हुआ करे तो बताया क्यों नहीं करती हो। फिर उन्होंने हाथों हाथ लाइट का तार खिंचवा कर मोटर लगवा दी। कहते है वक़्त कहाँ रुकता है। बस अपने निशान छोड़ जाता है।


दर्द आपके आगे दो पहलू रखता है।

या तो आप को पूरी तरह तोड़ देता है 

या फिर बेहद मजबूत बना देता है।

ये आपके ऊपर है कि आप आजमाइशों के दौर में अंधेरे में रहना चाहते है या उम्मीद की रोशनी के साथ आगे बढ़ना चाहते है।

और ये उम्मीद की रोशनी ही थी जिसकी वजह से में ओर मेरी माँ ने कभी हिम्मत नहीं हारी, मुझे समझ नहीं आता लोगो ने औरत को कमज़ोर का खिताब क्यो दिया है।क्या वो लोग नहीं जानते औरत तीन बार मौत से लड़ कर ज़िन्दगी की जंग जीत ती है।


जब वो पैदा होती है।

जब उसकी शादी होती है।

ओर सबसे मुश्किल जब वो माँ बनती है।


औरत ने तो मौत को भी हरा दिया।

फिर ए दुनिया तूने उसे कमज़ोर का नाम क्यो दिया।


जिन रास्तों को लोग मंज़िल समझ कर बैठ जाते है माँ उन रास्तों से गुज़रती चली गई। 

परेशानियां ' दर्द' तकलीफें

ज़िन्दगी का हिस्सा है

अगर दुख दर्द न हो तो खुशी का एहसास ही न हो।


किसी शायर का शेर है

मिटा दे अपनी हस्ती को गर कुछ मर्तबा चाहे

के दाना खाक में मिल कर गुले गुलज़ार होता है।


इसलिए आप किसी के भी मान ने वाले हो याद रखे वो किसी का साथ नहीं छोड़ता। क्योंकि मेरा अल्लाह बड़ा अज़ीम है...

जज़्बात सना के



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