असली धनी
असली धनी
गौरव ने रेस्त्रां में घुसते ही खाने का आर्डर दिया। शाही पनीर, दाल मख्खनी, बटर नान, सलाद, पापड़ इत्यादि। बेरा ने आर्डर नोट करके पाँच मिनट के अंदर ही लज़ीज खाना परोस दिया। पर यह क्या---? सारा खाना जूठा करने के पश्चात, गौरव का पारा सातवें आसमान पर--। वह एकदम से एटम बम की तरह फटते हुए रेस्त्रां मालिक पर बरस पड़ता है। "नान कच्चे हैं, दाल ढ़ग से फ्राई नहीं हुई और शाही पनीर खट्टा है। यह सारा खाना उसे पसंद नहीं, ले जाओ--- मुझे नहीं खाना--- यह सब-- और थाली को जोर से सरका देता है।" तभी छोटू भागकर थाली को लपक लेता है और खाना नीचे गिरने से बच जाता है। रेस्तरां का मालिक उसे दूसरा खाना परोस लेता है। जिसे गौरव गुस्से में नाक चढ़ाए, बड़बड़ाता हुए अनमने मन से खाने लगता है। तभी छोटू प्लास्टिक की थैली में बचा हुआ जूठा सा खाना इकट्ठा करके, बड़ी खुशी से झूमते हुए ऐसे नाचता है जैसे मुँह मांगा खजाना पा गया हो।"शेरू, झुमरू आ जाओ," वह जोर-जोर से आवाजें लगाता हुआ रेस्तरां से बाहर निकल आता है। खाना खाने के पश्चात् बड़बड़ाते हुए, गौरव रेस्त्रां से बाहर आकर देखता है, छोटू वहीं जूठा बचा हुआ खाना दोनों कुत्तों के साथ सड़क के किनारे जमीन पर पैर फैला बड़े मजे से चटकारे ले-लेकर खा रहा होता है। गौरव दो बार परोसे गए जिस लज़ीज खाने में अपने गुस्से तथा अहम् भाव के कारण खुशी और स्वाद नहीं पा सका, उसी की जूठन में दो कुत्तों के साथ छोटू खुशी, स्वाद तथा आत्म तृप्ति की असीम अनुभूति को पा जाता है।
