Sagar Motwani

Romance


4.1  

Sagar Motwani

Romance


अनोखा इज़हार

अनोखा इज़हार

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अरे सुनती हो ! अरे ओ भाग्यवान !” साठ साल के दौलतराम ने अपनी पत्नी, ज्योती को आवाज लगाई। “नहीं कान मे रूई डाल रखी है।” मीठा सा ताना देते हुए ज्योती ने रसोई से जवाब दिया। “अरे भाग्यवान, कभी तो मुझे भी समय दिया करो। मेरे पास भी दो घड़ी आकर बैठा करो।” “नहीं-नहीं, मैं कहा आपको समय देती हूं। ये बच्चे तो यूं ही पैदा हो गए।” “अरे बस भाग्यवान, मैं तो पूछ रहा था चाय पियोगी क्या ? मलाई वाली” “अच्छा तो ये बात है, आपको चाय पीनी है। तो ये नाटक क्यों कर रहे हो, मुझे टाइम नहीं देती। घर में बैठोगे और चाय चाय की रट लगाओगे और क्या पूछ रहे थे चाय पियोगी ? शादी को तैंतीस साल हो गए है, जैसे आज तक कभी चाय बनाकर पिलाई है ? ” “ठीक है ! मत बनाओ चाय बाहर थोड़े चक्कर लगा कर आता हूं।” “कोई जरूरत नहीं, अभी बाहर जाने की, बना रही हूँ चाय। मालूम है, बाहर चक्कर लगाने के तो बहाने है। फिर कहोगे भाग्यवान गुस्सा मत करो दोस्त मिल गया। वो दोस्ती की कसम देकर दो पैग पिला दिया। क्या करता दोस्ती की खातीर पिना पड़ा।” “अरे नहीं, पागल हो क्या बुधवार तो तुमने ही फिक्स किया है न। भई ! मार थोड़े न खानी है, तुम्हारी ” मज़ाक करते करते दौलतराम ठहाका मारकर हँस पड़े। “अच्छा और शनिवार को कौन पीता है मैं ?” “क्या तुम पीती हो ! मुझे तो नहीं बताया कभी और मैं कहता हूँ तो कहती हो, जहर सिर्फ शिव ने पिया था पार्वती ने नहीं।” कहते कहते दौलतराम फिर हँस पड़े। “चलो अब बस करो, ये हँसी ठठा और यहाँ बैठो, टी.वी चालू करो, मैं आती हूँ चाय बनाकर।”

ज्योती के रसोई में जाते ही हॉल मे कड़कदार खामोशी छा गई। दौलतराम टी.वी का स्वीच ऑन करके, रिमोट ढुंढने लगे। नहीं मिलने पर आवाज लगाने लगे “ ज्योती कहाँ हो, ये रिमोट नहीं मिल रहा। अरे सुनती क्यों नहीं जवाब तो दो।” मगर ज्योती ने जवाब नहीं दिया। जवाब नहीं मिलने पर दौलतराम परेशान हो गए और एकदम रसोई की तरफ जाने लगे। तभी ज्योती रसोई से निकल आई और कहने लगी "हद होती है चिल्लाने की। अभी तो कहा चाय बनाने को, और चाय बनाने भी नहीं देते। क्या हुआ क्यों चिल्ला रहे हो और रसोई में क्यों आ रहे हो।” “अरे, वो रिमोट नहीं मिल रहा था, टी.वी का।” “अरे तो मैं जेब मे लेकर घुम रही हूँ क्या ? जो रसोई मे आ रहे हो।” “नहीं ज्योती तुमने जवाब नहीं दिया न तो मैं परेशान हो गया।” दौलतराम ने ज्योती के कंघे पर हाथ रखते हुए, भावुक स्वर में कहा। ज्योती भी यह देखकर भावुक हो गई। पति का प्यार देखकर, उसकी आँखे नम हो गई। फिर खुद को संभालते हुए बोली "अरे आप तो फालतू मे चिंता करते हो। कुछ नहीं हुआ है मुझे, मैं तो गुस्से की वज़ह से जवाब नहीं दे रही थी। सोचा चाय लेकर जाऊँगी, तब जवाब दुँगी।” “नहीं ज्योती ! ऐसा फिर कभी मत करना, गुस्सा भले कर लेना पर बुलाने पर जवाब जरूर देना।” दौलतराम का इतना प्यार देखकर ज्योती की आँखो में पानी आ गया और कहने लगी " चलिए, चल कर बैठिये मैं चाय लाती हूँ।” “ हुम्म ! दौलतराम ने हामी भरी और हॉल में जाकर फिर रिमोट ढुढँने लगे, रिमोट मिलने पर सोफे पर बैठ गए और टी.वी चालू कर दी। “ये लिजिए आपकी चाय, पापड़, और गुड़ वाली सेव।” “अरे वाह ! क्या बात है, दिल खुश कर दिया।” “ अरे यह क्या ? चाय मे मलाई नहीं डाली।” “नहीं, आपको डॉक्टर ने मना किया है, मलाई खाने को।” “पर तुम्हे पता है ना चाय मे मलाई, मुझे कितनी अच्छी लगती है।” “हाँ तो क्या करूँ। नहीं मिलेगी, मतलब नहीं मिलेगी। चुप करके चाय पिलो नहीं तो ये भी ले जाऊँ।” “अरे स्वीटी, जानू, मेरी डार्लिंग ! आधा चम्मच मलाई डाल दो न मलाई बिना चाय अच्छी नहीं लगेगी।” “हे मेरे परमात्मा ! इस साठ साल के बुढ्ढे को सुमति दो। मैं तो समझा-समझा कर थक गई हूं।” “ठीक है, बुढ्ढे की बुढ्ढी ! अब जाओ और मलाई लेकर आओ।”

ज्योती रसोई मे गई और मलाई ले आई और कहा " ये लो मलाई तौबा दुनिया सुधर गई। पर आप न सुधरोगे।” दोनो चाय पीने लगे और टीवी देखने लगे हॉल मे फिर खामोशी छा गई। चाय पीते-पीते दौलतराम ने रिमोट उठाया और चैनल चैंज कर दिया, तो ज्योती को गुस्सा आ गया। “अरे ये क्या किया ? अच्छा भला चल तो रहा था चैंज क्यो कर दिया ? आप क्या जान बुझकर मुझे तंग करते है क्या ? मेरा शान्ति से बैठना आपको पसंद नही क्या ?” “नहीं ! हाँ, ज्योती ये सच है मुझे जब तक तुम्हारी आवाज़ नहीं सुनाई देती, मैं बैचेन हो उठता हूँ। इसलिए मैं तुम्हे जान बुझकर छेड़ता हूँ। तुम्हारी आवाज़ से ही घर घर लगता है। मैं डर जाता हूँ कहीं तुमसे बिछड़ना पड़ा तो। मैं अकेले जी नहीं पाऊँगा। इतनी उम्र गुजर गई, पर मैं तुमसे कभी नहीं कह पाया पर आज मैं तुमसे जरूर कहूँगा।” ज्योती अवाक् सी देखती रह गई। दौलतराम सोफे से नीचे उतर कर जमीन पर घुटनो के बल बैठ गया और ज्योती का हाथ हाथ मे लेकर कहने लगा "हाँ ज्योती ! मैं तुमसे शादी के तैंतीस सालो में कभी नहीं कह पाया। आज मैं कबूल करता हूँ कि मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूँ और आज से नहीं जब मैंने पहली बार तुम्हें देखा तब से ही। मैं तुम्हें प्यार करने लगा पर मर्द होने के गुरूर में, मैं तुम्हे कभी कह नहीं पाया। मैं तुम्हारे बगैर एक पल भी नहीं रह पाता। तुम हमेशा कहती थी ना प्यार करते होते तो कभी इजहार भी करते। पर तुम तो हमेशा लड़ाई करते रहते हो पर सच मानो तो मैं कभी-कभी तुमसे लड़ाई भी जानबुझकर करता था। क्योकि मैं जानता था मेरी तंग स्थिति देखकर तुम कभी कुछ फरमाईश नहीं करती। मगर लड़ाई मे तुम भोलेपन से रोते हुए कह ही देती थी कभी मेरे लिए खारी बिस्किट लाए हो, कभी मेरी पसंद की मीठी वाली नमकीन लाए हो और फिर उस दिन घर के लिए क्या लाना है, मुझे अंदाजा हो जाता था और मैं पुरी कोशिश करता था …”

“…मैं आज कबूल करता हूँ और तुम्हारे आगे अपने प्यार का इज़हार करता हूँ। जानता हूँ, बहुत देर कर दी, मैंने। पर मैं सच कहता हूँ ज्योती ! मैं तुम्से जी जान से प्यार करता हूँ और परमात्मा से प्रार्थना करता हूँ कि हर जन्म मे जीवनसाथी के रूप में मुझे तुम ही मिलो।” “लेकिन सुनिये अगले जन्म मे मैं आपका पति बनूँगी।” ज्योती के ऐसा कहते ही दोनो हँस पड़े और फिर हँसते-हँसते गले मिल कर दोनो रो पड़े।


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