“अरे यार, कितने लोग उतरेंगे? ट्रेन चलने लगेगी, जल्दी उतरो!”
शोरगुल के बीच यह आवाज़ मेरे कानों तक पहुँची, पर मेरा ध्यान केवल दिल्ली पहुँचने पर था। भीड़ इतनी थी कि साँस लेना मुश्किल, फिर भी किसी तरह मैं ट्रेन में चढ़ ही गया। मन में आस थी कि बैठकर सफ़र करूँगा, मगर तक़दीर को कुछ और ही मंज़ूर था—सीट नहीं मिली। अब जाना तो था, सो खड़ा हो गया।
“अरे यार, आज भी इतनी भीड़ है! मम्मी से कहा था टिकट करा दो, अब खड़े होकर जाना पड़ेगा...”
यह वही आवाज़ थी जो मैंने ट्रेन में चढ़ने से पहले सुनी थी। मैंने मुड़कर देखा—वह सफ़ेद दुपट्टे में खड़ी थी। उसे देखकर एक अजीब-सा अहसास हुआ, जैसे कहीं पहले देखा हो। शायद इसलिए कि वह मेरे ही शहर से चढ़ी थी।
ट्रेन चल पड़ी। खिड़की से हल्की ठंडी हवा भीतर आ रही थी। मैं खिड़की के पास खड़ा हो गया, पर मन बार-बार उसकी ओर खिंच रहा था। उसने भी एक नज़र मेरी तरफ़ डाली, फिर झट से निगाहें फेर लीं।
“कुछ चेहरों से,
एक अनजान रिश्ता-सा होता है,
मिलते हैं राहों में,
पर मुकम्मल नहीं होते हैं...”
वह खिड़की के पास खड़ी थी। हवा में उसके खुले बाल लहरा रहे थे। उसकी आँखों में कुछ था—एक अनकहा-सा अहसास, जैसे कोई भूली हुई याद, जैसे कोई पुरानी धुन जो कानों में धीमे-धीमे गूंज रही हो।
मैंने आँखें बंद कीं और अपने दिल की धड़कनों को महसूस किया। यह क्या था? एक अनजानी-सी ख़्वाहिश, जो सिर्फ़ देखने तक सीमित थी। मैंने फिर उसकी तरफ़ देखा—वह गहन विचारों में डूबी थी, शायद उसके मन में भी वही चल रहा था—
“कुछ लोग मिलते हैं,
बस मिलने के लिए,
मगर तक़दीर उनके हक़ में
कोई दास्तान नहीं लिखती...”
ट्रेन अपनी रफ़्तार से भाग रही थी, मगर वक़्त जैसे ठहर गया था। हम दोनों ने कई बार एक-दूसरे को देखा, मगर शब्दों का कोई पुल न बन सका। बस निगाहों का एक सफ़र था, जो बिना किसी ठिकाने के जारी था।
स्टेशन क़रीब आ रहा था और मेरे मन में अजीब-सी कसक थी। क्या यह यूँ ही ख़त्म हो जाएगा? क्या कुछ बातें केवल आँखों में रह जाती हैं? शायद हाँ...
“कुछ अफ़साने मुकम्मल नहीं होते,
कुछ कहानियों के किरदार कभी नहीं मिलते,
पर वो एक लम्हा,
दिल की किताब में हमेशा ज़िंदा रहता है...”
ट्रेन रुकी। वह उतरी और जाते-जाते पल भर को मुस्कुराकर मेरी ओर देखा। फिर भीड़ में गुम हो गई।
और मैं वहीं खड़ा रह गया—जैसे किसी अनकही दास्तान का आख़िरी पन्ना।