अनजाना डर
अनजाना डर
ब्याह के बाद विदाई के समय उर्मि जितना दुखी थी उतना ही उसके मन में अनजाना सा डर भी था। अनजाना सफर और अनजान साथी। क्या होगा?कैसे होगा? इसी सोच में डूबी हुई वह ससुराल पहुँच गई।
ससुराल में सबने उसका जोरदार स्वागत किया। किसी भी तरह की कोई कमी महसूस नहीं होने दी। छोटे बड़े सब उसका बहुत ध्यान रखते पर वह मन ही मन सदा भयभीत रहती। एक अनजाना भय उसे हमेशा सताता रहता।वह चाह कर भी सहज नहीं हो पा रही थी।मनीष उसका पति हमेशा
उसका ध्यान रखता और खुश रखने का प्रयत्न करता पर सब बेकार।वह चाहकर भी अपनी बहन के साथ घटे उस हादसे को नहीं भुला पा रही थी जिसने ससुराल में उसकी जान ले ली थी। आग से जलने का वह हादसा वह कभी नहीं भुला पाई।
देखते ही देखते पहली दीपावली आ गई। सब बहुत खुश थे। दीपावली पूजन के बाद सब दीए जलाने व पटाखे जलाने लगे। वह भी दीपक जलाने के बहाने छत पर आ गई।
चारों तरफ दीए जगमगा रहे थे। वह गुमसुम सी खड़ी उन्हें निहारती रही। तभी अचानक मनीष उसे खोजते खोजते वहाँ आ पहुँचा। क्या सोच रही हो उर्मी ? इतनी गुमसुम क्यों हो ? उसके दोनों हाथोंं को अपने हाथोंं में लेकर मनीष ने कहा-
अपने सारे भय मन से निकाल दो उर्मि। अब तुम मेरी जिम्मेदारी हो। मैं तुम्हें हर हाल में खुश रखूंगा। जीवन के इस सफर हम एक दूसरे का सहारा बनकर रहेंगे और दीपों के मद्धम प्रकाश में उर्मि आँखों ही आँखों में मुस्करा दी।
