अधूरी कहानी
अधूरी कहानी
सर्द रात, घना कोहरा और रेलवे स्टेशन पर बमुश्किल 20-25 लोगों की मौजूदगी। स्टेशन के एक कोने में अलाव जल रहा था, जहाँ कुछ लोग गप्पों में मशगूल थे, तो दूसरी तरफ कुछ लोग चाय की चुस्कियों में खोए हुए थे। कोहरे की वजह से ट्रेन 'लेट' थी, या यूँ कहें कि बहुत ज्यादा लेट थी। मैं भी बुरी तरह बोर हो रहा था। ठंड और सिगरेट की तलब मुझे बाहर खींच लाई। मैं अपना बैग लेकर स्टेशन से बाहर निकला और सिगरेट सुलगा ही रहा था कि तभी एक ऑटो आकर रुका। ऑटो से एक महिला उतरी—लंबा कद, छरहरा बदन, ठंड से बचने के लिए पहना गया लॉन्ग कोट और उस पर गुलाबी शॉल, जो उनकी सुंदरता में चार चाँद लगा रहे थे। वह तेज मगर सधे हुए कदमों से मेरे पास आईं और बोलीं, "लाइटर या माचिस है आपके पास?" उनकी आवाज में जैसे ताजा शहद की मिठास घुली थी। मैंने कुछ झिझकते हुए माचिस की डिब्बी उनकी ओर बढ़ा दी। उन्होंने सिगरेट अपने गुलाबी होंठों के बीच दबाई—जैसे गुलाब की पंखुड़ियों पर कोई भंवरा बैठा हो। जब उन्होंने सिगरेट जलाई और धुआं बाहर निकाला, तो पल भर के लिए मेरा दिल जैसे धड़कना ही भूल गया। आज से पहले किसी भी महिला ने मुझे इस कदर आकर्षित नहीं किया था। बात आगे बढ़ाने के लिए मैंने सीधे पूछा, "कहाँ तक का सफर है?" उन्होंने नपा-तुला जवाब दिया। मैंने फिर पूछा, "क्या मैं आपका नाम जान सकता हूँ? आप क्या करती हैं?" एक ही सांस में मैंने सवाल दाग दिए। वह हल्का सा मुस्कुराईं और बोलीं, "एक माचिस की तिल्ली क्या दी, आप तो चांस मारने लगे!" मैं बुरी तरह सकपका गया। मेरी घबराहट देख वह खिलखिलाकर हँस पड़ीं और बोलीं, "अरे घबराइए नहीं, मैं तो बस मजाक कर रही थी। मैं डॉ. अंजू आरा हूँ, मुंबई के लीलावती हॉस्पिटल में कार्डियोलॉजिस्ट (Cardiologist) हूँ।" तभी तो मेरा दिल उन्हें देखकर इतनी जोर से धड़क रहा था! मैं कुछ कहता, उससे पहले ही वह बोलीं, "मेरे दो बच्चे हैं और अंदर स्टेशन पर सास-ससुर के साथ मेरा इंतज़ार कर रहे हैं।" यह सुनना मेरे लिए किसी झटके से कम नहीं था, जैसे ऊपर से कोई भारी बोझ गिर पड़ा हो। इससे पहले कि मैं अपनी निराशा संभाल पाता, वह बोलीं, "चलिए, आपको घर की बनी अदरक वाली चाय पिलाती हूँ।" इतना कहकर उन्होंने अधजली सिगरेट फेंकी और स्टेशन के अंदर की ओर चल दीं। मैं भी भारी कदमों से उनके पीछे हो लिया। अंदर पहुँचते ही दो छोटे बच्चे 'मम्मा-मम्मा' कहते हुए उनसे लिपट गए। साथ में एक बुजुर्ग दंपत्ति भी बैठे थे। बुजुर्ग व्यक्ति ने कहा, "अंजू, तुम इतने जरूरी पेपर घर छोड़ आई थीं! भला हो इस कोहरे का जिसकी वजह से ट्रेन लेट हो गई और तुम समय पर लौट आईं।" बुजुर्ग महिला ने भी प्यार से टोकते हुए कहा, "हमें तो कुछ करने ही नहीं देती, हॉस्पिटल और घर का सारा काम खुद ही करती हो।" अंजू ने बात काटते हुए मेरी तरफ इशारा किया, "अब्बा, ऑटो वाले को देने के लिए मेरे पास छुट्टे पैसे नहीं थे, सो इनसे उधार लिए थे। मैंने कहा था कि अंदर आपसे लेकर दे दूंगी।" बुजुर्ग ने तुरंत जेब से पैसे निकालने चाहे, पर मैंने मना कर दिया। अंजू ने मुस्कराते हुए कहा, "पहले चाय पीते हैं।" चाय पीते हुए अंकल ने मेरा परिचय पूछा। मैंने बताया, "जी, मेरा नाम आदित्य सिंह है और मैं एक लेखक हूँ।" अंकल ने उत्साह से पूछा, "अच्छा! क्या लिखते हैं आप?" साथ ही उन्होंने घर के बने आलू के पराठे मेरी तरफ बढ़ा दिए। भूख लगी थी और चाय-पराठे के उस स्वाद ने मन तृप्त कर दिया। मैंने अपने बैग से अपनी एक प्रकाशित पुस्तक उन्हें भेंट की। उन्होंने खुश होकर कहा, "वाह! अब मेरा सफर इसे पढ़ते हुए आराम से कटेगा। उम्मीद है बोर नहीं करोगी।" सब हंस पड़े। अंजू ने भी एक किताब की फरमाइश की, लेकिन तभी आंटी ने पूछा, "बेटा, घर में कौन-कौन है? शादी हुई या नहीं?" मैंने कहा, "नहीं आंटी, अभी तक कोई मिला ही नहीं... और एक मिली भी तो..." तभी अनाउंसमेंट हुई कि मुंबई जाने वाली ट्रेन प्लेटफॉर्म पर आ रही है। सब सामान समेटने लगे। बातों-बातों में अंकल ने बताया, "हमारी पांच बेटियाँ और एक बेटा था। सबकी शादी हो गई, लेकिन मेरा डॉक्टर बेटा कोविड के दौरान लोगों की सेवा करते हुए शहीद हो गया।" यह कहते हुए उनकी आँखें भर आईं। डॉ. अंजू के प्रति मेरा सम्मान अब और बढ़ गया था। विदा लेते समय अंजू ने कहा, "मेरी बुक उधार रही।" मैंने वादा किया कि मैं अपनी नई किताब उनके हॉस्पिटल के पते पर भेजूंगा। अंकल ने मेरा कार्ड लिया और वादा किया कि कहानी पसंद आने पर फोन करेंगे। मैंने उन्हें बताया कि मेरी कहानियाँ 'स्टोरी मिरर' (StoryMirror) ऐप पर भी उपलब्ध हैं। ट्रेन आई और मैंने सबको बोगी के अंदर बैठाया। चलते-चलते अंजू ने एक जानलेवा मुस्कान के साथ हाथ हिलाकर विदा ली और कहा, "याद रहे, आप पर उधार है!" मैं प्लेटफॉर्म पर खड़ा तब तक उस ट्रेन को देखता रहा, जब तक कि वह धुंध और कोहरे में ओझल नहीं हो गई।

