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Aditya Singh

Romance

4  

Aditya Singh

Romance

अधूरी कहानी [खामोश धड़कन की गूंज]

अधूरी कहानी [खामोश धड़कन की गूंज]

4 mins
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 बहुमंजिला इमारत के गलियारे में तेज़ी से बढ़ते कदमों की चाप सुनाई दे रही थी। लंबा कद और चाल में गजब का आत्मविश्वास—यह डॉ. अंजू आरा थीं। रास्ते में जो भी उनका अभिवादन करता, वे शालीनता से सिर हिलाकर जवाब दे देतीं। उन्होंने अपने चैंबर का दरवाज़ा खोला, जिसके बाहर लगी नेमप्लेट पर गर्व से अंकित था— 'डॉ. अंजू आरा, डी.एम. (कार्डियोलॉजिस्ट)'। अंदर मौजूद नर्स और जूनियर डॉक्टरों ने उनके सम्मान में खड़े होकर उनका इस्तकबाल किया। अंजू ने मुस्कुराहट के साथ सबका हाल पूछा, लेकिन उनकी आँखों के नीचे के काले घेरे थकान और किसी छिपे हुए दर्द की गवाही दे रहे थे। जब एक नर्स ने उनकी सेहत के बारे में पूछा, तो उन्होंने हमेशा की तरह "ऑल इज़ वेल" कहकर बात टाल दी और सीधे मरीज़ों की रिपोर्ट्स देखने लगीं। तभी एक कुरियर वाला पार्सल लेकर अंदर आया,बोला मैंम किताब हैं,वहीं मेज पर रख दो।" अगले तीन घंटे वे पूरी तरह काम में डूबी रहीं। थकान जब हावी होने लगी, तो अंजू ने ब्रेक लेने का फैसला किया। कॉफी का इंतज़ार करते हुए उनकी नज़र उस पार्सल पर पड़ी। जैसे ही उन्होंने किताब का पहला पन्ना खोला, उनके चेहरे की थकान गायब हो गई और एक ताज़ा गुलाब जैसी मुस्कान खिल उठी। अचानक उनके भीतर एक नई ऊर्जा का संचार हुआ। उन्होंने नर्स से कहा, "बाकी मरीज़ों को जल्दी बुलाओ, मुझे आज घर जल्दी निकलना है।" जूनियर डॉक्टर दंग थे कि जो मैम हमेशा देर तक अस्पताल में रुकती थीं, आज उनमें यह कैसा उत्साह था? अतीत की गलियों से विरासत के आँगन तक गाड़ी में बैठते ही अंजू ने फिर वही किताब खोल ली। पन्ने पलटते ही वे उस सर्द रात की यादों में डूब गईं। उन्हें याद आया कि कैसे ट्रेन में उनकी अम्मी (सास) ने आदित्य के बारे में पूछा था, और अब्बा ने मज़ाक में कहा था, "बेटा, तुम्हारी पूरी उम्र पड़ी है, अगर तुम चाहो तो..." तब अंजू ने झुंझलाकर बात काट दी थी, पर उनके गालों की लाली कुछ और ही कह रही थी। उन्होंने खुद से कहा था, "वह तो महज़ एक अनजाना मुसाफिर है।" लेकिन वह मुसाफिर अब उनकी सोच का हिस्सा बन चुका था। गाड़ी जब उनके पुश्तैनी महलनुमा घर के सामने रुकी, तो यादों का सिलसिला टूटा। यह घर उनके परदादा ने बनवाया था—मजबूत और गौरवशाली, जिसने बंटवारे का दंश झेला पर अपनी जड़ों को नहीं छोड़ा। घर के बड़े बरामदे में दाखिल होते ही दोनों बच्चे 'मम्मा-मम्मा' कहते हुए उनसे लिपट गए। दिन भर की थकान उन नन्हीं बाहों के घेरे में जैसे फना हो गई। गुलाबी लिबास और रूहानी शायरी फ्रेश होने के बाद अंजू ने गहरा गुलाबी अनारकली सूट पहना। गीले बालों की बूंदें और गुलाबी रंग का वह निखार उन्हें किसी परी जैसा रूप दे रहा था। हाथ में कॉफी का मग लिए जब वे अपने बिस्तर पर अधलेटी हुईं और किताब खोली, तो उनकी नज़र आदित्य की लिखी उन पंक्तियों पर ठिठक गई: 

"तुम्हारी आँखों के नीचे ये जो घेरे काले हैं, 
शायद इनमें ही छिपे मेरे कुछ सवाल निराले हैं। 
तुम दुनिया के बीमार दिलों की धड़कन संभालती हो,
पर क्या खबर है... तुम्हारे खुद के दिल में कितने छाले हैं?"

अंजू की धड़कनें तेज़ हो गईं। अगला शेर तो जैसे सीधे उनके वजूद से सवाल कर रहा था: 

"लकीरों में तेरा अक्स ढूँढते हैं, 
 हम अपनी हर धड़कन में तेरा नाम ढूँढते हैं,
नशा उनकी आँखों का कुछ ऐसा चढ़ा मुझ पर, 
 कि अब हम खुद में भी बस उन्हें ही ढूँढते हैं।" 

 एक अनकही कशमकश किताब पढ़ते हुए अंजू के मन में द्वंद्व (Conflict) छिड़ गया। "क्या यह सही है? मैं एक विधवा हूँ, हमारे धर्म अलग हैं, समाज क्या कहेगा? क्या मेरे बच्चे उसे स्वीकार कर पाएंगे? क्या वह मेरे बच्चों को पिता का प्यार दे पाएगा?" सोचते-सोचते न जाने कब उनकी आँख लग गई। रात के 11 बजे जब अम्मी ने उन्हें खाने के लिए जगाया, तो वे डाइनिंग टेबल पर पहुँचीं। बातों-बातों में अब्बा ने आदित्य का जिक्र छेड़ दिया। उन्होंने कहा, "अंजू, उस लड़के (आदित्य) की दूसरी किताब आई है। पहली देशभक्ति पर थी, पर यह एक अधूरी प्रेम कहानी लगती है। कल उसे फोन करके बधाई दूँगा। वह शरीफ लड़का है, उसे कभी घर पर बुलाना चाहिए।" अंजू ने बात काटते हुए कहा, "अब्बा, मुझे भी किताब भेजी है उसने, पर कुछ खास नहीं है।" लेकिन अम्मी की अनुभवी आँखें देख पा रही थीं कि अंजू कुछ छिपा रही है। खाना खाकर सब अपने कमरों में चले गए। सन्नाटा गहरा गया, पर अंजू की आँखों में नींद नहीं थी। उन्होंने एक सिगरेट सुलगाई और फिर से वह किताब हाथ में ले ली। वे जितना आगे बढ़ रही थीं, उतना ही उस 'अनजाने मुसाफिर' की दुनिया में खोती जा रही थीं। सालों बाद उनके भीतर कुछ बदल रहा था... एक ऐसा एहसास जिसे वे नाम देने से डर रही थीं। तभी किताब के आखिरी पन्ने पर एक हाथ से लिखी हुई लाइन दिखी, जिसने अंजू के हाथ से सिगरेट छुड़ा दी...

......Adi🖋


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