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Nitu Mathur

Drama Classics Inspirational

4  

Nitu Mathur

Drama Classics Inspirational

आशीर्वाद

आशीर्वाद

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“आहना बस आ गई है, जल्दी करो बेटा”, एक हाथ में lunch box और एक में bag पकड़े हुए संजीव जी आहना को उसकी स्कूल बस में बैठा रहे थे, प्रतिमा उनकी बहू अपने हाथ में अपनी छोटी बेटी “अन्वी” को उठाए दरवाजे से आहना को bye करके अंदर चली गई। “पापा आपके नाश्ते में क्या बनाना है?” प्रतिमा अपने ससुरजी से पूछने लगी, “कुछ नहीं बेटा, तुम चिंता मत करो, चार्मी का ध्यान रखो, मैं मंदिर से आते हुए जलेबी समोसे ले आऊँगा बस वही खा लेंगे”। अपने सहज और स्नेह अंदाज़ में संजीव जी ने अपनी बहू को कहा और फिर वो अपनी दिनचर्या में लग गए। पिछले 3 महीने से उनका लगभग यही routine बन गया था, वो सुबह जल्दी नहा धो कर पूजा करके अपनी पोती को स्कूल बस में बिठाते और फिर सोसाइटी के मंदिर में दर्शन करके अपने साथी दोस्तों के साथ थोड़ा समय बिताते थे, दोपहर में अपनी पोती को बस से उतरना, उसके साथ समय बिताना, घर का कोई छोटा मोटा सामान लाना फिर शाम को थोड़ा टहल कर वापस बच्चों के साथ समय बिताते थे। उनकी बहू प्रतिमा जिसे वो अपनी बेटी की तरह मानते थे, वो भी संजीव जी को अपना पिता समान ही समझती थी और उनका आदर करती थी। 


संजीव जी का बेटा पार्थ ऑफिस के किसी प्रोजेक्ट के लिए 8 महीने के लिए US गया हुआ था, अपनी पत्नी प्रतिमा की डिलीवरी के 3 महीने बाद ही उसे जाना था, उसने प्रतिमा से कहा कि तुम परेशान मत होना, चाहो तो अपने मम्मी पापा के यहाँ जा सकती हो, या फिर यहाँ, पापा ने कहा है कि वो ध्यान रखेंगे सब का। प्रतिमा एक बहुत ही सुलझी हुई महिला थी, वो नहीं चाहती थी कि पार्थ अपनी कंपनी से मिला ये अवसर छोड़ दे, उसने कहा “तुम मेरी चिंता मत करो पार्थ मैं यहाँ अपने घर में ही रहूँगी और पापा और मैं मिलकर सब संभाल लेंगे।” “ तुम बेफिक्र होकर जाओ और अपना प्रोजेक्ट कम्पलीट करके आ जाओ”। इधर संजीव जी भी पूरे जी जान से अपनी बहू और पोतियों का ध्यान रखते थे। घर परिवार और सोसाइटी के लोग भी ये देखकर उनको बहुत आदर सम्मान देते थे और प्रतिमा को कहते थे कि तुम बहुत भाग्य वाली हो जो तुम्हें पिता समान ससुर मिले हैं। इधर प्रतिमा भी संजीव जी को पिता से बढ़कर मानती थी उनकी दवाइयों का और खाने पीने का ध्यान रखती थी। 


संजीव जी की पत्नी अपने बेटे पार्थ के जन्म के समय ही गुजर गई थी, अपने दुख को अंदर दबाकर उन्होंने पार्थ को बड़ा किया और पढ़ा लिखाकर उसे लायक बनाया, वो नहीं चाहते थे कि उनका दुख उनके दायित्व और जिम्मेदारी से ऊपर हो जाये। अपनी नौकरी के साथ साथ उन्होंने पार्थ की भी अकेले ही देखभाल की और आज उनका बेटा एक बहुत बड़ी कंपनी में ऊँचे पद पर कल कर रहा है, अपनी पसंद की लड़की से शादी करके दो बेटियों का पिता भी बन चुका है। संजीव जी जानते हैं कि जीवन में दुख सुख का आना जाना लगा ही रहता है लेकिन अगर परिवार में प्यार और मजबूती हो तो आदमी कभी भी निराश हताश नहीं रहता है। अपने रिटायरमेंट के बाद उनकी दुनिया अपना घर परिवार और अपने साथी ही थे। 


कहते हैं कि तकलीफ़ समय देखकर नहीं आती, एक दोपहर संजीव जी अपने कमरे में सो रहे थे तभी उनको पोती आहना दौड़ के उनके पास आई और कहा कि “दादू , मम्मी के पेट में बहुत दर्द हो रहा है,व्यू रो रहीं हैं”, संजीव जी तुरंत प्रतिमा के पास गए , वो पेट पकड़े कराह रही थी और बेड पर लेटी नन्ही अन्वी भी रो रही थी। संजीव जी तुरंत बाहर गए उन्होंने ड्राइवर से बोलकर गाड़ी निकलवाई और फिर दोनों बच्चों और प्रतिमा को लेकर हॉस्पिटल पहुंचे, वहाँ इमरजेंसी में प्रतिमा को ले जाया गया, संजीव जी बच्चों को संभालते हुए बेंच पर बैठ कर इंतज़ार करने लगे, क़रीब 40 मिनट बाद डॉक्टर आई और उसने बताया की “उसके पोस्ट डिलीवर इश्यूज़ के कारण stitches में swelling आ गई है, लेकिन घबराने की कोई बात नहीं है प्रतिमा ठीक है, आप थोड़ी देर बाद उसे ले जा सकते हैं”, सुनकर संजीव जी को राहत मिली और वो बाद में बच्चों के साथ प्रतिमा को भी घर ले आए। उन्होंने कहा कि “बेटा तुम आराम करो, बच्चे मेरे पास हैं बाद में अन्वी को देख लेना अगर उसे भूख लगी हो।” ये सब देखकर प्रतिमा का दिल आदर सम्मान से और आँखे आंसुओं से पूरी भर आयीं , वो देख रही थी कि किस तरह अपनी उम्र को नकारते हुए, अपने घुटनों के दर्द को संभालते हुए संजीव जी हिम्मत और फुर्ती से उसका और बच्चों का ध्यान रख रहे हैं। वो मानती है कि अगर कहीं भगवान हैं तो यहीं हैं, उसके पिता समान ससुर जी के रूप में , उसके लिए सबसे  बड़े आशीर्वाद की तरह। इतना प्यार, आशीर्वाद और देखभाल सच में किस्मत वालों को ही मिलता है। 


2 दिन बाद दवाई और आराम से प्रतिमा की सेहत बेहतर हो गयी थी, उसने पार्थ से भी फ़ोन पर बात की और सब बताया और कहा कि मैं ठीक हूँ। वो संजीव जी के पास गई और कहा “पापा , ये दूध पी लीजिए, संजीव जी ने उसके सर पर हाथ फेरा और आशीर्वाद दिया, प्रतिमा ने अपनी नम आँखों से कहा, “जिसके ससुरजी  पिता से भी बढकर अपनी बहू का ध्यान रखते हों, उस बेटी को कुछ नहीं हो सकता है पापा, है ना, और आपके पास तो तीन बेटियां हैं।” संजीव जी ने तसल्ली वाले अंदाज़ में कहा, “हाँ बेटा, बिल्कुल”। 


 जरूरी नहीं है कि एक स्त्री ही घर को प्यार से जोड़े रखती है, मन में अगर सबके लिए प्यार सम्मान और सहानुभूति हो तो एक पुरुष भी अपने घर को जोड़कर रख सकता है, परिवार को प्यार के धागे में बांध कर रख सकता है। संवेदनशीलता को अपने स्वभाव में लाएं, हर रिश्ते में ख़ूबसूरती से निभायें। आशीर्वाद और स्नेह के धागों से ही खूबसूरत रिश्ते बुने जाते हैं चाहे वो बाप बेटी हो या ससुर बहू। 


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