आज़ाद होने जा रही हूं
आज़ाद होने जा रही हूं
चूल्हे पर तड़के के लिए में रखी हुई पतीली में तेल उबल चुका था। भाप निकलने लगी कि तुरंत सुरभि ने गली में 'वंदे मातरम्' के नारे की आवाज़ सुनी। तड़का करने में जल्दबाजी करूंगी तो ठीक नहीं रहेगा ऐसा सोचकर गैस की सगड़ी का बटन बंद करके सुरभि गली की ओर पड़ते दरवाज़े की ओर दौड़ी। बाहर जाकर देखा तो स्कूल के बच्चें सफेद यूनिफार्म में झंडा लेकर देशभक्ति के नारे से पूरा रास्ता गजा रहे थे। और कतार में चलते बच्चों के साथ शिक्षक भी थोड़ी थोड़ी दूरी पर चल रहे थे। यह देखकर खुद भी इन बच्चों के साथ एक शिक्षक बनकर चल रही होती ऐसा आह सुरभी के मुंह से निकल गई।
देश को आजादी मिलने के 75 साल पूरे होने पर माननीय वडाप्रधान ने आजादी का अमृत महोत्सव मनाने के लिए घर घर तिरंगे का ऐलान कर दिया था। रोम रोम में जोश भर दे ऐसे नारे लगा कर बच्चों का जुलुस जा रहा था। रास्ते की दोनों और लोग जुलस देखने के लिए इकट्ठे हुए थे। और घर के दरवाज़े पर खड़ी सुरभि भी यह सुंदर दृश्य देख रही थी। जुलस धीरे धीरे यहां से गुजर गया। बाद में नारोंकी आवाज धीमी होकर बंद हो गई तब तक सुरभि घर के दरवाजे में खड़ी रही। लोग बिखर गए और वो पत्थर की तरह खड़ी रही। फिर कटाक्ष में बोली, "आजादी . . . आजादी का अमृत महोत्सव। और उसके चेहरे पर कटाक्षभरी हँसी आ गई। आंखों की पलकों पर एक आंसू भी छलक गया। थोड़ी देर बाद दरवाजा बंद करके वह रसोई में गई और यंत्रवत् खाना पकाने के काम में लग गई। काम पूरा होने के बाद दोपहर को वह कमरे में गई और पलंग पर लेट गई। आज उसका पति परेश दोपहर को खाने के लिए नहीं आनेवाला था।
सुरभि सोच में पड़ी। उसके दिलो-दिमाग में 'आज़ादी' शब्द जैसे हथौड़े मार रहा था। अंग्रेजों की गुलामी में से मुक्त होने के बाद भी यह समाज अभी भी ऐसी निम्नकक्षा की मानसिकता में स सड़ रहा है यह सोच कर उसे समाज के लिए धिक्कार पैदा हुआ।
बहुत दिनों के बाद आज फिर से सुरभि उसके भूतकाल में चली गई थी। दिखावे में सुंदरता की मूरत और नटखट जिद्दी स्वभाव की सुरभि को शिक्षक बनने का सपना था। मध्यम परिवार में से आ रही सुरभि बहुत संस्कारी लड़की थी ग्रेजुएट होने के बाद B.Ed किया। पढ़ने में बहुत होशियार थी इसलिए सारे अच्छे मेरिट आने की वजह से उसे सरकारी स्कूल में नौकरी भी मिल गई। उसका सपना पूरा होने पर वह बहुत खुश थी। बचपन से कोई पूछे कि तुझे बड़ा होकर क्या बनना है १ तो तुरंत बोल पड़ती कि, "शिक्षक बनना है "। और अब वह शिक्षक बन गई थी।युवान थी इसलिए उसके मम्मी पापा को उसकी शादी की चिंता होने लगी। इसके लिए कैसा जीवनसाथी मिलेगा १ युवान बीटिया कब तक घर में रखेंगे ! ऐसा सोचकर उसके लिए लड़का ढूंढने लग गए। सुरभि को भी पूछ लिया कि तेरा कहीं मन लगा हो तो बोल दे लेकिन सुरभि ने कहा, कि मन लगेगा तो बोल दूंगी'। ऐसा कहके हंस के बात टाल देती थी। ऐसे में छुट्टियां आई और सुरभि को मामा के बेटे की शादी में जाना पड़ा वहां। वहाँ मामा के बेटे के दोस्त परेश से उसकी मुलाकात हुई। सुंदर दिखती सुरभि परेश को देखते ही भाग गई। परेश की पर्सनालिटी देखकर सुरभि भी उसकी ओर खींची चली। बात घर तक पहुंचते पता चला कि परेश अमीर परिवार का एकलौता बेटा था जो करोड़ो की संपत्ति का मालिक था। देश विदेश में भी उसके पिता की कंपनियां चल रही थी। सुरभि के मम्मी पापा खुश हो गए और सुरभि तो पसंद ही थी इसलिए शादी की बात आगे चली। दोनो पक्षों की रजामंदी से बहुत कम समय में दोनों की बड़ी धाम धूम से शादी हो गई। घर में ऐशोआराम की जिंदगी थी।
सारी संपत्ति, दौलत सब सुखसाहबी सुरभि को मिली थी। जैसे सपना हो ऐसी जिंदगी सुरभि जी रही थी। और शादी के लिए ली हुई छुट्टियां पूरी होते ही एक दिन सुबह उसने टेबल पर सब साथ मिलकर खाना खा रहे परिवार के सामने कहा, "कल से मैं मुझे स्कूल में जाना है। " यह सुनकर तुरंत सबके चेहरे बदल गए।उसके साँस ससुर और नंनद के चेहरे पर नाराजगी छा गई और सुरभी कुछ बोले उससे पहले उसके ससुर बोले, "बेटा, अब नौकरी जाने की बात छोड़ दो। भगवानकी दया से सब कुछ है। ऐसे सुखी और अमीर घर की बहू नौकरी के लिए बाहर जाए यह हमें अच्छा नहीं लगता समाज में हमारी बदनामी हो जाएगी। लोग क्या सोचेंगे१ “ सुरभि तो यह सुनकर सुन्न हो गई। हिम्मत करके बोली, " पापा मुझे पैसेके लिए नौकरी नहीं करनी है। शिक्षक बनना मेरा बचपन का सपना है मुझे बच्चों को पढ़ाना है। " “नहीं बेटा, किसी भी हाल में अब तू नौकरी नहीं करेगी। " अब तक चुप बैठे सांस जैसे आदेश देते हो वैसे बीच में बोल उठे। तुरंत सुरभिने परेश के सामने देखा तो परेश कुछ भी बोले बिना देखकर खाना अधूरा छोड़ कर चला गया। माहौल गमगीन हो गया। लेकिन संस्कारी सुरभि कुछ ना बोली और शांति से "अच्छा मम्मी " बोल के लेकर अपने कमरे में चली गई। शाम को परेश घर आएंगे तब मैं नौकरी करने के लिए उन्हें मनाऊंगी ऐसा सोचकर अपने मन को मनाने का प्रयास किया पर पूरा दिन वह बेचैन रही। ससुराल आने के बाद पहली बार सुरभि के चेहरे पर आज बेचैनी छाई थी। शाम को परेश के आते ही सुरभि ने कपड़े बदल के बाथरूम से जैसे वह बाहर आया कि फिर से वही नौकरी की बात छेड़ी तो परेश ने प्रेम से उसका हाथ अपने हाथ में लेकर गाल पर चुंबन करते हुए बोला, " शुरू क्यूं जिद करती है ? छोड़ दो ना।
मम्मी पापा नहीं चाहते कि उनकी बदनामी हो। हमारे पास इतनी दौलत है कि तुम नौकरी करोगी तो लोग क्या कहेंगे ?
और वैसे भी मम्मी पापा की मना करने पर भी तु नौकरी जाएगी तो हमारा परिवार कैसे खुश रह सकेगा१ छोड़ दो जिद। " सुरभि ने परेश को समझाने का बहुत प्रयास किया लेकिन वह ना माना और गुस्से से रूम के बाहर चला गया। आखिर में सुरभि ने भी हार मान ली और नौकरी ना करने की बात मान ली। दूसरे दिन आंख में आंसू के साथ दिल पर पत्थर रख के स्कूल में इस्तीफा दे दिया। करोड़ों की मालकिन सुरभि जैसे कि आज निराधार हो गई। उसका सपना चकनाचूर हो गया।नौकरी छोड़ने के बाद सुखी और समृद्ध सुरभि की एक के बाद एक स्वतंत्रता आजादी छीन की गई। यहाँ तक की घर में भी हमेशा सीसीटीवी कैमरे में नजरकैद रहना पड़ता था। अगर बाहर जाना होता तो ड्राइवर को साथ लेकर जाना पड़ता। रास्ते में जाति सुरभि को गोलगप्पे कl ठेला देखकर पहले के जैसे गोलगप्पे खाने का मन करता तो कभी-कभी रिमझिम बारिश में भीगने का मन हो जाता। लेकिन अब तो बड़े घर की बहू थी इसलिए यह सब करने की रजामंदी नहीं थी। समाज की मर्यादा बीच में आ जाती थी। परेश उसके पापा के साथ पूरा दिन बिजनेस में व्यस्त रहता था।और सांस कीटीपार्टी में खोई रहती थी। नौकर चाकर से घिरी हुई सुरभिको कोई भी काम नहीं रहा था। उसने एक दिन परेश के साथ ऑफिस में काम करने की बात की तो फिर उसमें भी विरोध हुआ।घर में सुरभी अकेली हो गई थी। आखिर में उसने सोने के पिंजरे में से आजाद होने के लिए तलाक लेने को सोचा। और वह अपने लिए अपने तरीके से जीना चाहती थी। सपने की पँख फैला के ऊंचे आकाश में उड़ना चाहती थी। पर वही पता चला कि वह मां बनने वाली है।आने वाले बच्चे का विचार करके सुरभि ने आजाद होने का विचार छोड़ दिया थोड़े महीने बाद जुड़वा संतानों की माता बनी। सुरभी अब बच्चों की परवरिश में खोई रहने लगी।धीरे-धीरे वह आज़ादी की बात भूल गई।
अब शादी के बीस साल हो गए थे। बच्चें कॉलेज जाने लगे थे। बिजनेस में एक हिस्सेदार की गद्दारी से परेश और उसकी फैमिली रास्ते पर आ गए थे। सांसससुर की एक कार अकस्मात में मृत्यु हो गई थी। ननंद शादी करके अमेरिका चली गई थी। और कुदरत ने मारी हुई ठोकर से सुरभि की सारी संपति छीन ली थी। उसके कंपनी के भरोसेमंद व्यक्ति जो परेश लिए खुद के भाई से भी अधिक था उसने गद्दारी करके सब कुछ छीन लिया। उसके सामने केस लड़ते-लड़ते परेश बिल्कुल तबाह हो गया। दगाबाजी से सब कुछ खो देने के बाद पर इसने छोटा कारखाना शुरू किया। सुरभि बड़े बंगले में से एक छोटे मकान में आ गई। इस हालत में भी कई बार उसने कोई प्राइवेट स्कूल में नौकरी जाने की बात कि तो परेश ने मना कर दिया। “एक गुणवान स्त्री का काम घर संभाल के बच्चे बड़े करने का होता है इसलिए बाहर जाना और नौकरी करने हमें शोभा नहीं देता। मैं रात दिन मेहनत करके आपकी सारी जरूरत पूरी कर दूंगा”। ऐसा बोलकर परेश ने उसकी बोलती बंद कर दी। इस बार भी सुरभि का कुछ ना चला। पूरा दिन घर में रहकर वह अकड़ जाती।
टीवी सीरियल भी कितनी देखती आखिर !! आजाद होने के लिए तड़पती सुरभि की जवानी भी अब चली गई। बाल सफेद होने लगे थे। उसने सोचा पूरे देशने आजादी का अमृत महोत्सव तो मना लिया लेकिन एक नारी का इस सुरभि के आजादी का क्या ? ? उसके आंखों में से आंसू की धारा बहने लगी। बहुत सालों बाद उसने आज एक निश्चय कर लिया आजादी पाने का। शाम को जब परेश घर लौटा तो सुरभि को आवाज लगाई।कोई आवाज ना आने पर वह कमरे में गया और देखा तो वहां बेड पर सुरभि लेटी हुई थी और उसके पास ज़हर की बोतल पड़ी हुई थी। दूसरे हाथ में एक कागज था। पहले तो वह कुछ समझ ना पाया और हक्का-बक्का हो गया। खुब रोया, चिल्लाया लेकिन अब सुरभि आजाद हो चली थी।परेश ने सुरभि की मुट्ठी में एक कागज देखा। हाथ में से कागज उठाया और तो उसमें लिखा था " जा रही हूं। परेश, अब मैं आजाद होने जा रही हूं हमेशा के लिए। "
