ज़िन्दगी
ज़िन्दगी
सुन जिन्दगी!तेरी कहानी कुछ ऐसी हो,
मेरी अदालत में कभी तेरी पेशी हो,
तेरी हाजिरी के सपने देखूं मैं,
ऐ ज़िन्दगी,और वो हकीकत में तब्दील हो ।
न्याय के दरबार में मुंसिफ बना बैठूं मैं,
सजायाफ्ता खड़ी हो कठघरे में तू,
फैसले लेने का हक हो सिर्फ मेरा,
और तू बेबस सी मुवक्किल हो ।
आंखों पे ना हो कोई पट्टी बंधी,
इंसाफ़ का तराजू हो हाथों में मेरे,
अपने सारे गुनाह तू कुबूल करे,और,
मौत की आगोश़ में तू मुजम्मिल हो ।
ऐ जिन्दगी!तेरी कहानी कुछ ऐसी हो,
मेरी अदालत में कभी तेरी पेशी हो,
फैसले लेने का हक हो सिर्फ मेरा,
और तू बेबस-सी मुवक्किल हो ।
--
