ज़िन्दगी ~ एक कारवाँ
ज़िन्दगी ~ एक कारवाँ
ज़िन्दगी के इस सफर में,
हम थोड़े उलझे सुलझे से रहते हैं।
कभी हँसते, कभी गाते,
कभी रोते कभी रुलाते,
हर मंज़र पार करते जाते हैं।
ख़ुशी हो या हो ग़म,
मुस्कुराते हुए हम आगे बढ़ते जाते हैं।
मंज़िल की ओर बढ़ते राह में,
कभी ठहरना भूल जाते हैं।
कभी ठहरे हुए बीते लम्हों को,
फिर से जीना चाहते हैं।
हर पल बढ़ते हुए कदम,
मंज़िल की ओर ले जाना चाहते हैं।
कभी चलते चलते राह में,
रास्ता भटक भी जाते हैं।
समुन्दर की कश्ती में,
सवारी भी करना चाहते हैं।
अपना हौसला उसकी गहराइयों सा,
रखना चाहते हैं।
बढ़़ते कदम कोई रोक न ले,
इसलिए बढ़ते चले जाते हैं।
चलते चलते राह में कई,
अफ़साने भी छोड़ जाते हैं।
मंज़िल पाते ही हम उस राह से,
अगली मंज़िल की ओर निकल जाते हैं।
शायद इसलिए .....
ज़िन्दगी के इस सफर में,
हम थोड़े उलझे सुलझे से रहते हैं।
