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shubhi gupta

Tragedy

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shubhi gupta

Tragedy

यह समाज मुझे कैसे अपनायेगा

यह समाज मुझे कैसे अपनायेगा

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नन्ही किलकारी से अपनी आंखें खोली

अपने आपको अपनी मां की गोद में पाया

अरे यह लड़की है,सबको दुखी मन से कहते पाया ।

यह समाज मुझे कैसे अपना आएगा।

जिंदगी में आगे बढ़ी थी पाबंदियां मुझ पर बड़ी थी

खेलकूद छुड़वा कर घर के कामों में लगवाया था

लड़की हो तुम इस बात का एहसास मुझे हर पल दिलवाया था

यह समाज मुझे कैसे अपना आएगा।

समाज की बातों का फर्क नहीं पड़ता एहसास मुझे उस इंसान ने भी कराया जिसने मुझे जन्मा था

यह समाज मुझे कैसे अपना आएगा।

हर कदम पर यह एहसास दिलाना कि तुम लड़की हो

अपनी हद में रहो, तुम्हें दूसरे घर जाना है।

मुझे इस बात का एहसास हर पल दिलाया जाता है।

समाज मुझे कैसे अपना आएगा |

जब मांगी थी मैंने किताबे तो बांध दिया मुझे रिश्तो के धागों में उलझ सी गई थी मे उन रिश्तो में।

यह समाज मुझे कैसे अपनाएगा।

जिसने जीवन भर साथ रहने का बादा किया था।उसने भी एहसास दिला दिया कि तुम लड़की हो। अपनी हद में रहो।

यह समाज मुझे कैसे अपनाएगा।



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