यादों का कारवाँ
यादों का कारवाँ
वो भी क्या दिन थे…..
कभी जब मैं यहाँ आया करती थी,
तो यहाँ कितना खुशनुमा माहौल हुआ करता था।
पर आज यहाँ कितना सब कुछ वीरान पड़ा हुआ है,
वो कितने रंगीन दिन थे जब चारों तरफ फूलों की खुशबू आया करती थी।
आज ना जाने वह रंगीनियाँ कहां खो गई है,
पहले लोग मुझे इस खिड़की से ताका करते थे।
परंतु आज चारों तरफ जिंदगी इतनी चरमरा गई है,
कि मेरे को यहांँ कोई भी नजर नहीं आ रहा।
सारा वातावरण खुद ही परिस्थिति को बयाँ कर रहा है,
वह दिन न जाने कहां पखेरू बनकर उड़ गए।
आज धरती का यह माहौल कितना बदरंग लग रहा है,
कल और आज में जमीन आस्माँ का फर्क है।
जब भी इस खिड़की में कोई आता था मुझे पकड़ने,
तो मैं भी इठलाती, बलखाती हुई उड़ जाती थी।
आज कब से मैं घंटों यहां टकटकी लगाए खड़ी हूंँ,
कब खिड़की खुले और मैं फिरकी बन कर उड़ जाऊँ।
