यादें की छाया
यादें की छाया
तेरे साथ साथ चलने को तमन्ना था मन में
धूप हो या ठंड हो या हो रिमझिम बरसात
मीठी मीठी बातें में कैसे गुजर जाता है वक्त
फिर हम पहुंच जाते अपने मंजिल पर
और ये हमें बिलकुल पता ही नहीं चलता !
ये देखो ! कैसे हम रास्ते पर अकेले चल रहे हैं
जाना है हमें दूर ,बहुत दूर .........
शायद उस पहाड़ के उस पार दूर दिगंत तक
मंजिल कहां पर है , अबतक हमें पता ही नहीं है
पर जानेमन ! बिलकुल अकेला नहीं हैं हम
गौर से देखो ! अहसास कर लो यार !
तेरे यादें की छाया कैसे चलती है मेरे साथ
मन ही मन प्यार की गीत गाते गुनगुनाते हुए .... !
