STORYMIRROR

Uncle Sam

Tragedy

3  

Uncle Sam

Tragedy

व्यथा

व्यथा

1 min
271

कब से कुछ लिखने की सोच रहा हूँ

चाह कर भी कुछ लिख नहीं पा रहा हूँ


सुबह से लेकर रात तक ऑफिस ऑफिस ऑफिस

इस काम के दलदल में फंसा जा रहा हूँ


मेरी भी कुछ ख़्वाहिशें हैं जो अधूरी हैं अबतक

सोच सोच के परेशान हुआ जा रहा हूँ


किसे समझाऊँ किसे मनाऊं अपनी हालत किसे दिखाऊँ

कहीं घेर न ले मुझे निराशा पागलों की तरह हँसता जा रहा हूँ


है काम ज़रूरी समझता हूँ मैं भी बिना बताये

ज़रूरी है मेरा खुद का होना यह बात क्यों कोई समझ न पाए।


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Tragedy