व्यथा
व्यथा
कभी सोचती हूँ
क्या हम साथ होकर भी साथ हैं?
एक रास्ते पे चल रहे हैं बंध के यूँ ही,
पर क्या मंजिलों के पड़ाव एक हैं?
मैं चंचल हूँ इक नदी की तरह, बहते जाना स्वभाव है मेरा,
तेरा ठहराव नहीं भाता है मुझे, आईना बन जाता है मेरे अस्तित्व के अंत का
बदले हो तुम भी थोड़ा, थोड़ा मैंने भी खुद को समेट लिया परिधियों में,
लेकिन रेत को मुठ्ठी में कब तक दबा पाया है कोई,
लगता है फिसल ही जाना है मुझे यूँ ही ज़िन्दगी से तुम्हारी।
नहीं हूँ मैं उन कुछ चिड़ियों की तरह,
जो पिंजरे में रहकर इश्क़ कर लेती हैं अपने रहनुमा से।
मुझे प्यार है अपने पंखों से उतना ही, जितनी मोहब्बत तुम्हारी रूह से की थी।
घोंटा हर पल अपने अरमानों का गला,
पर क्या करूँ मेरे हैं ना, मरते ही नहीं,
फड़फड़ाते हैं हर पल आज़ाद होने को, आसमान की आरज़ू जो है इन्हें।
आज ख्वाब सारे मेरे तुम्हारी मोहब्बत के तलवों तले दबे पड़े हैं,
जिन्हें सोचा था साथ मिलकर , परिंदों की तरह गगन पर टांक आएंगे।
क्यों अहमियत बदल जाती है इक चहचहाती चिड़िया की,
जब वो दिल से निकलकर अपने प्रियतम के नीड़ को संवारने लगती है?
क्यों जीवन पूरा होने से पहले लग जाता है अंकुश उनके जीने पर,
क्या वाकई ख्वाबों का भी कोई लिंग होता है?
