मेरी डायरी
मेरी डायरी
जब सोच के पंछियों ने, यूँ ही कभी अंगड़ाई ली,
जब जज़बातों के भँवर ने, अपनी ही गहराई ली,
जब ये बादल, ये पंछी, ये नदियों का पानी,
ये बच्चों की हँसी के प्यारे से गुंजन,
मुझसे यूँ ही कुछ कहने लगे,
मुझे बस तुम याद आयी, बस तुम्हीं याद आयी।
तुम्हीं तो हो, हाँ तुम्ही तो हो,
जिसने खुद में मुझे समेट रखा है।
मेरी आँखों के आंसू, मेरी पुतलियों की चमक,
मेरे शर्म से खिलते गालों की लाली,
कितना कुछ है तुझमें समाया।
मेरी तन्हाइयों के लम्हे, मेरे मन के वो छाले,
वो राज़ों के दस्ते, वो पल प्यार वाले,
कितना कुछ है तुझमें समाया।
वो अटखेलियां बचपन की सारी,
वो अम्मा की लोरी, वो चाय लाड़ वाली,
वो मातृत्व का एहसास,
वो पुनः बचपन जीने की बिरली कहानी,
कितना कुछ है तुझमें समाया।
वो हर एक नज़र में प्यार होने के किस्से,
वो हमनज़र को हमसफर बनाने के हिस्से,
वो कुछ आध्यात्म के पन्ने और कुछ बिखरी सी
परिपक्व हुई बच्ची की नाराजगी,
कितना कुछ है तुझमें समाया।
सखी बुलाऊँ या कहूँ मेरी छाया,
ममता के आंचल सा सुकून तुझमें पाया,
औरों की नजरों में बस है डायरी तू मेरी,
पर मेरे लिये पलछिनों से भरी तश्तरी है तू मेरी।
