वो....
वो....
वो बैठें रूबरू जब तक
नज़र अटकी रहे उनपर
वो जब उठ कर चले जायें
ये ऑंखें भीग जाती हैं
वो खुद में ही रहें उलझे
और हम उनमें उलझ जाते
ये पलके झुक ही जाती हैं
जब नज़दीक जाती हैं
उन्हें ना फ़िक्र मेरी गर
मुझे उनसे शिकायत क्या
वो जो एक नज़र देखें
दिलों को रीझ जाती हैं
उन्ही से हैं ये दिन रौशन
उन्ही से रात महताबी
उन्हींं से पल में टकराकर
ये सांसें भीग जाती है।

