STORYMIRROR

Prerna Raghuwanshi

Abstract

4  

Prerna Raghuwanshi

Abstract

वो अक्सर मिल ही जाता है।।

वो अक्सर मिल ही जाता है।।

1 min
23.4K

वो अक्सर मिल ही जाता है मुझे 

उन सपनों के गलियारों में


हँसते गाते रंग अनेक उड़ाते 

कुछ रंग लाल हैं उनमें 

जो प्रीत की गाथा गातें 

कुछ हैं गुलाबी जो

नयी उम्मीद जगाते 

कुछ पीले हैं जो

बसंत की याद दिलाते


वो अक्सर मिल ही जाता है मुझे 

उन सपनों के गलियारों में


वो अपनी धुन में आगे आगे चलता जाता

मैं दौड़ उसे क्यों पकड़ना चाहूँ

वो मौज में अपनी ही बहता जाता

मैं कैद उसे क्यों करना चाहूँ

वो कश्ती मौजी मिल ही जाती है किनारों में


वो अक्सर मिल ही जाता है मुझे 

उन सपनों के गलियारों मे. 


वो पुरवाई का झोंका है

मैं बूँद घटा की लगती हूँ

संग उसके नाचूँ इधर उधर

मैं खुद से जुदा सी लगती हूँ

बरसूं संग संग उसके मैं 

खेतों में खलियानों में 


वो अक्सर मिल ही जाता है मुझे 

उन सपनों के गलियारों में


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract