STORYMIRROR

Sudhir Srivastava

Abstract

4  

Sudhir Srivastava

Abstract

विश्वगुरू

विश्वगुरू

1 min
168

कितना अजीब लगता है

यह देखना सुनना

कि हम बड़े अजीब हैं

दुनियां को पता है कि

आखिर हम क्या चीज हैं।


पर हम खुद नहीं जानते

कि हम क्या चीज हैं।

हम तो बस विडंबनाओं में ही

जीने के आदी हैं,


अपना दिमाग भर चलाते हैं

बस उसे धरातल पर लाने से

जरा कतराते हैं।

पर हम भी क्या करें

आदत से मजबूर जो हैं,


आखिर अपना भारत

जुगाड़ का विश्वगुरू जो है।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract