वीर भगत सिंह
वीर भगत सिंह
हे वीर तेरी अमर प्रेम कहानी जिसकी ना कोई सानी,
जिसे सुन सुन गर्वित होते सारे हिन्दुस्तानी,
हे वीर छोड़ गये जगत को जबसे तुमने,
हुआ ना दूजा तुमरे जैसा जगत में,
है कौन यहाँ जो तुम जैसा प्रेम किया,
मातृप्रेम में निछावर होकर जो अपना उस उम्र में वलिदान दिया,
जिस उम्र में लोग बेचारे होते हैं,
अपनी माँ के आँचल के बड़े न्यारे होते हैं,
हाय फिर भी सतप्रेम समझ ना पाते हैं,
क्षणिक प्रेम में पड़कर खुद को बर्बाद कर जाते हैं,
समझ ना पाते हैं उस प्रेम का ज्ञान,
जिसे समझ कितने प्रेमी हो गये वलिदान,
है कौन जो अपनी माँ से कहे रोना नहीं अब मैं
तेरी नहीं रहा जान,
अब मैं उस माँ का लाल हूँ जिसकी डूब रहा है आन,
हे माँ उस माँ के आन बचाने हेतु देने जा रहा हूँ मैं अपना वलिदान,
जा रहा हूँ है काम बहुत आन बचाने हेतु ,
फेंकूँगा बम भी अंधे और बहरे को सुनाने हेतु ,
जब एक बच्चे का आकार विकराल हुआ ,
लाहौर में सॉण्डर्स का इंतकाल हुआ ,
फिर फेंक दिया बम असेंबली में बहरे को सुनाने हेतु ,
माँ के आन बचाने को सोये लोगों को जगाने हेतु ,
पर भागा नहीं अपनी जान बचाने हेतु ,
रुक गया वहीं पर माँ का कर्ज चुकाने हेतु ,
पकड़ा गया अंग्रेजों से और अपना दण्ड स्वीकार किया,
एक 23 साल के बच्चे की शहादत भारतवासियों ने स्वीकार किया,
उस शहादत की रात सारे भारतवासी की आंखें नम हुई ,
उस रात एक ऐसी अमर प्रेम कहानी का जन्म हुआ,
जिसकी दूजा ना कभी कोई सानी होगा,
मिट सके ना एक ऐसी प्रेम कहानी होगा ।
