वह बेर का पेड़ कह रहा था मुझ से
वह बेर का पेड़ कह रहा था मुझ से
उस दिन घर में कुछ कहासुनी हो गई थी
गुस्से में आगबगूला मैं
निकल पड़ा था किसी अनजानी राह पर
आज वह बेर का पेड़ फिर दिख गया
हरे पीले बेर लटके हुए
डालियाँ हिलती हुई
मानों मुझ से कुछ कह रहे हो
जिन्दगी का दर्शन देते हुए
“देखो मैं हूँ बेर का पेड़
देता हूँ खट्टे मीठे बेर,
पत्ते भी होते बहुत
फूल और काँटे भी अकूत
जिन्दगी की मिठास और कड़वाहट का देता हूँ सबूत
और यही है मेरी विशेषता
और शायद जिन्दगी की भी”
बात कुछ कुछ समझ पा रहा था मैं
सच ही तो हैं
बेर खाली खट्टे हो या खाली मीठे
तो शायद हमें वह स्वाद न मिल पाए
जैसे कभी खट्टे और कभी मीठे बेर
का मिश्रित स्वाद हमें तृप्त करता है।
इसी तरह शायद जिन्दगी भी
एक ही ढर्रे पर चले तो शायद
जिन्दगी का मजा ही ख़त्म हो जाए
मिठास के साथ कड़वाहट न हो तो
मिठास का मोल ही हम नहीं समझ पाएंगे
खुशियों के साथ दुःख न हो जिन्दगी में तो
खुशियों का महत्व कैसे हम समझ पाएंगे ?
फिर क्यूँ हम छोटी छोटी बातों को दिल से लगाते हैं ?
कुछ न कहते हुए भी आज उस बेर के पेड़ ने
बहुत बड़ा सन्देश दिया था
शायद ईश्वर ने उस बेर के पेड़ के माध्यम से
जिन्दगी जीने का नया रास्ता दिखाया था
तभी उस बेर के पेड़ के नीचे पड़े मिले
कुछ बेर, उदास, हताश, कुचले हुए से
शायद किसी राहगीर ने पैरों से कुचला होगा
तभी किसीके सिसकने की आवाज़ आई
शायद कोई रो रहा था
देखा तो एक कुचला हुआ बेर आँसू ढलका रहा था
“देखो, जब तक डाल से जुड़ा था
मेरी एक इज्जत थी,
लेकिन आज जो परिवार से विलग हूँ
तो समाज के पैरों तले कुचला गया हूँ
तुम भी क्यूँ गुस्से में वही गलती कर रहे हो ?”
मैं ठिठक गया, कुछ सोचने लगा
और मैंने अंतर्मन की आवाज़ सुन ली
और उलटे पाँव घर लौट चला
घर पहुँचा तो देखा
पत्नी और बच्चे बेसब्री से इंतजार कर रहे थे
मैंने उन्हें गले लगा लिया
सब कुछ पहले जैसा था
तभी गुस्से भरी आवाज़ आई
“दस बज गये हैं अभी तक आपने नाश्ता नहीं किया
ऐसे कैसे काम होगा, चलिए फटाफट नाश्ता कीजिये”
आज मुझे पत्नी पर गुस्सा नहीं आ रहा था।
एक बेर ने मुझे आईना दिखा दिया था
जिन्दगी का दर्शन समझा दिया था
और मैं खुशी खुशी नाश्ता करने लगा
आज जिन्दगी अच्छी लग रही थी।
