STORYMIRROR

Jaiprakash Agrawal

Abstract

4  

Jaiprakash Agrawal

Abstract

वाह रे जमाना

वाह रे जमाना

1 min
457

हमने खोद दी हैं पेड की जडें

और काट दी हैं पतंग की डोर 

रिश्तों के सूर्य पर लग गया ग्रहण

चल पडे हम स्वर्ग से नर्क की ओर

  

माता पिता के चरणों में अब स्वर्ग कहां? 

रमता है मन रमणियों का संसर्ग हो जहाँ

मकान हमने बना दिए पर उजड गए घर

अपने ही हाथों लुट गए सफर में कारवां


सोचा न था वक्त ऐसा भी आएगा 

श्रवण कुमार जिन्दा न रह पाएगा

माता पिता रहेंगे वृद्धाश्रम में 

बेटा पत्नी सहित मौज मनाएगा 


ऐसे नालायक बच्चों से कहनी है एक बात

माता पिता को रुष्ट कर कटेंगे न दिन रात

तीक्ष्ण होती है वृद्धों की हाय की कटार 

झेल न पाओगे तुम उनका मर्मस्पर्शी आघात


काट डाला वृक्ष तो छाया कहां से पाओगे

न रहा वृक्ष तो मीठा फल कहां से खाओगे

अरे मूढ, चेत अब वरन बाद मे पछताओगे

पोछ न लेगा आंसू कोई जब जब इसे बहाओगे।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract