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S Ram Verma

Romance

4  

S Ram Verma

Romance

उत्तकंठ अभिलाषा !

उत्तकंठ अभिलाषा !

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तुम गूंजने लगती हो 

इस देह व आत्मा रूपी 

मेरे समेत अस्तित्व के 

ब्रह्माण्ड में ! 

बिलकुल मंदिर में बजती 

घंटियों की तरह और धरती 

की तरह काटने लगती हो  

चक्कर मेरे मैं के चारो 

ओर !

मैं से हम बनाने की 

उत्तकंठ अभिलाषा लिए 

तुम उस पल में एक 

योगाभ्यासिनी के स्वरुप 

होती हो !

और मैं होता हूँ तुम्हारा 

वैदिक मंत्र जिसे उच्चारित 

कर तुम पा लेती हो मेरा 

समूल ! 

और एहसास भर देती हो 

मेरे अंदर सम्पूर्णताः का 

फिर उस सुबह स्वर 

गुंजारित प्रतीक्षारत हो 

उठता हूँ !  

उसी मौन का जो मुझमे

जगाती है तुम्हारे प्रेम की 

आकंठ प्यास !


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