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ritesh deo

Abstract

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ritesh deo

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तुम्हारी अनुपस्थिति

तुम्हारी अनुपस्थिति

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जब तुम्हें मेरे साथ जागना चाहिए था⁣

तब तुम हर बार एक गहरी नींद में थी⁣

मैं घुटनों पर सर रख के बैठा⁣

करता रहा इंतज़ार तुम्हारे जागने का रात भर⁣

जब तुम्हें थामना चाहिए था मेरा हाथ कस कर⁣

तब तुम्हारे हाथों ने फूल थाम रखे थे⁣

मेरे हाथ अपने फूल न होने पर⁣

तुम्हारे हाथों से इंच भर की दूरी से⁣

हर बार उदास और खाली लौट आए मेरी जेबों में⁣

तुम्हें रोना चाहिए था जब मेरे साथ बैठ कर ⁣

तब तुमने क हेमन्त परिहार⁣जब तुम्हें मेरे साथ जागना चाहिए था⁣

तब तुम हर बार एक गहरी नींद में थी⁣

मैं घुटनों पर सर रख के बैठा⁣

करता रहा इंतज़ार तुम्हारे जागने का रात भर⁣

जब तुम्हें थामना चाहिए था मेरा हाथ कस कर⁣

तब तुम्हारे हाथों ने फूल थाम रखे थे⁣

मेरे हाथ अपने फूल न होने पर⁣

तुम्हारे हाथों से इंच भर की दूरी से⁣

हर बार उदास और खाली लौट आए मेरी जेबों में⁣

तुम्हें रोना चाहिए था जब मेरे साथ बैठ कर ⁣

तब तुमने कहा ख़ुश रहना सीखो⁣

मेरे वो आँसू जिनका नमक⁣

तुम्हारी छाती पर जमना चाहिए था प्रेम बन कर⁣

वो सारे जमीन पर गिरे⁣

और स्वादहीन हो गए⁣

तुम्हारी अनुपस्थिति,⁣

किसी काई की तरह जमती रही वहाँ⁣

फिर एक दिन तुम जागी अचानक नींद से⁣

और कहा चलो...⁣

लेकिन इंतज़ार से अकड़े मेरे घुटनों से ⁣

मैं उठ नही पाया⁣

तुमने हाथ बढ़ाया,मेरे हाथ तब भी ⁣

इंच भर दूरी से लौट आए वापस⁣

तुमने रोते हुए कहा-आओ मेरे सीने से लग जाओ⁣

मैंने कोशिश की उठने की लेकिन

जमीन पर गिरे मेरे आंसुओं से जमी काई पर ⁣

फिसल कर गिर गया ⁣

और फिर कभी नहीं उठ पाया।


हा ख़ुश रहना सीखो⁣

मेरे वो आँसू जिनका नमक⁣

तुम्हारी छाती पर जमना चाहिए था प्रेम बन कर⁣

वो सारे जमीन पर गिरे⁣

और स्वादहीन हो गए⁣

तुम्हारी अनुपस्थिति,⁣

किसी काई की तरह जमती रही वहाँ⁣

फिर एक दिन तुम जागी अचानक नींद से⁣

और कहा चलो...⁣

लेकिन इंतज़ार से अकड़े मेरे घुटनों से ⁣

मैं उठ नही पाया⁣

तुमने हाथ बढ़ाया,मेरे हाथ तब भी ⁣

इंच भर दूरी से लौट आए वापस⁣

तुमने रोते हुए कहा-आओ मेरे सीने से लग जाओ⁣

मैंने कोशिश की उठने की लेकिन

जमीन पर गिरे मेरे आंसुओं से जमी काई पर ⁣

फिसल कर गिर गया ⁣

और फिर कभी नहीं उठ पाया।


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