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Dr.Ankit Waghela

Abstract

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Dr.Ankit Waghela

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तुलसी!

तुलसी!

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हम गुलनाज़ समझे..

रौशन गलियारों में ढूंढे..

यारा! वो क्यारी की तुलसी निकली

बिन फूल के भी ऐसे महके..

घर मेरा बागबान सा चमके..


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