Nikita Panchal
Abstract
मेरे जिस्म से निकल के तुझसे मिली
मेरे आने की आहट तुझे मिली
शायद मंज़ूर नहीं था खुदा को मिलना
इसी लिए तेरी हूं किसी और से मिली।
सीते
दरमियान
किसके लिए
शिवाय
तुझसे मिली
छुपाएं
आंखो में
नहीं होगी
बेरंग
तेरी जोगन
मन में विचार कौंधा .. सावन की बूंद और नारी ? नारी और सावन की बूँद ? मन में विचार कौंधा .. सावन की बूंद और नारी ? नारी और सावन की बूँद ?
नहीं मालूम सफर का कितनी दूर किनारा है, इस सफर दिल हमारा कितनी ही बार हारा है, नहीं मालूम सफर का कितनी दूर किनारा है, इस सफर दिल हमारा कितनी ही बार हारा है...
जीना है मुझे बस इसी के खातिर खैर यह बात भी मंजूर है मुझे जीना है मुझे बस इसी के खातिर खैर यह बात भी मंजूर है मुझे
बातों की ये घुट्टी, हर दिन घिस कर, उसे चटायी जाती हैं l बातों की ये घुट्टी, हर दिन घिस कर, उसे चटायी जाती हैं l
क्यों इतनी दूरियां सी हो गई है आखिर ये मजबूरियां और बेबसी क्यों क्यों इतनी दूरियां सी हो गई है आखिर ये मजबूरियां और बेबसी क्यों
रहूँगी ऐसी ही हमेशा जो बदल जाए भला वो पिंकी कैसी ! रहूँगी ऐसी ही हमेशा जो बदल जाए भला वो पिंकी कैसी !
आज अपेक्षित योद्धा तुझसे कठिन लक्ष्य संधान का। आज अपेक्षित योद्धा तुझसे कठिन लक्ष्य संधान का।
एक दोस्त मिलता है, तब होती है जिन्दगी की शुरूआत। एक दोस्त मिलता है, तब होती है जिन्दगी की शुरूआत।
बेबस बन परमेश्वर को ढूंढ़ते रहते हैं अपने अंदर के परमेश्वर से हम मिलना कब चाहते हैं? बेबस बन परमेश्वर को ढूंढ़ते रहते हैं अपने अंदर के परमेश्वर से हम मिलना कब ...
बहना ब्याह कर ससुराल जाये, प्यार भाई को दूज पर खींच लाये। बहना ब्याह कर ससुराल जाये, प्यार भाई को दूज पर खींच लाये।
देखा है मैंने पहली रोटी गाय को अंतिम रोटी कुत्ते को बिना रुके देती रही माई ने देखा है मैंने पहली रोटी गाय को अंतिम रोटी कुत्ते को बिना रुके देती रही माई ने
समय के साथ ही ये रस्म महज औपचारिक होकर रह गई। समय के साथ ही ये रस्म महज औपचारिक होकर रह गई।
तो यह जग फिर से रंगों से लहराएगा रंगों से लहराएगा। तो यह जग फिर से रंगों से लहराएगा रंगों से लहराएगा।
और ये नारी हाँ यही नारी, बुराई का संहार भी कर जाएगी। और ये नारी हाँ यही नारी, बुराई का संहार भी कर जाएगी।
शिव ही हर रोशनी का मूल दीप है शिव ही हार और शिव ही जीत है शिव ही हर रोशनी का मूल दीप है शिव ही हार और शिव ही जीत है
स्वतंत्र भारत अभी भी दूर की कौड़ी सी ही लग रही है। स्वतंत्र भारत अभी भी दूर की कौड़ी सी ही लग रही है।
हर कोई को हाथ खिंचने का चाहिए बस उनको एक बहाना है हर कोई को हाथ खिंचने का चाहिए बस उनको एक बहाना है
हाँ अब काफी साल बीत गए पुरानी बातों को याद करके हाँ अब काफी साल बीत गए पुरानी बातों को याद करके
गुरु द्रोण का पुत्र वही जिसका जीवन बिता कुछ ऐसे गुरु द्रोण का पुत्र वही जिसका जीवन बिता कुछ ऐसे
बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ का हर रोज गान है, फिर भी मानते बेटियों से बढ़कर बेटों की शान है बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ का हर रोज गान है, फिर भी मानते बेटियों से बढ़कर बेटों क...