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ritesh deo

Abstract

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ritesh deo

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ठगी

ठगी

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ठगी केवल रूपए पैसो की ही नहीं होती

भावनाओं की भी होती

प्यार उमड़ता

सरलता का लाभ उठाया जाता


शुरू होता

शोषण निर्मल हृदय का

जाल फैलाया जाता

ताने-बाने इस तरह रचे जाते


केवल वे ही सही है

शहद सी मीठी बातें

दिखावटी स्नेह की लड़ियां

दिल दिमाग की जमीन

 को ठगने उपजाऊ बनाती


माली होता तथाकथित ठग

जब चाहा लाभ उठाया

सामने वाला समझ न पाया


एक दिन ऐसा भी आता

दोहन कर तेल निकाल लिया जाता

फिर फेंक दिया जाता

तब समझ आता

सब को खुश रखने के चक्कर में

स्वयं भंवर जाल में फंस गए ।


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