थोड़ी नासमझ हूँ न
थोड़ी नासमझ हूँ न
थोड़ी नासमझ हूँ न
मन को समझा लेती हूँ
नासमझ किरदार हूँ
समझ का ढोंग ही कहलो पर
पर अल्हड भी नहीं हूँ जी!
क्यूंकि तुम्हारे सुलझे जवाबों से ही
तो तुम्हारी विवेचना करती हूँ
आखिर तुम्हारी समझ के
सुरों पर ही तो मैं
अपनी ताल मिला लेती हूँ
थोड़ी नासमझ हूँ न
मन को समझा लेती हूँ
वो तुम्हारे सराहते कटाक्ष
झकझोरते हैं पर
मुस्कुराती हूँ मैं कि तुम
गर्वित महसूस करो हमेशा
तो खुद को बहला लेती हूँ
थोड़ी नासमझ हूँ न
मन को समझा लेती हूँ
तुम्हारी व्यस्त पहलू में आकर
जब अर्ज़ी अपनी लगाती हूँ और
तुम्हारे सिर्फ सुनते रहने का तंज़ लिए
फिर एक ओर सिमट जाती हूँ
सोचती हूँ शिकन न आये
तुम्हारी ज़िम्मेदारियों के ललाट पर
थोड़ी नासमझ हूँ न
मन को समझा लेती हूँ
सुनते सुनाते सब कुछ निभाते
क्यों कुंठित सा मन है
ये ज़रूर तुमसे पूछना है मुझे
कभी वक़्त निकाल पाओ तो
आवाज़ ज़रूर लगा देना
दिन भर की थकान के बाद भी
मैं दौड़ी चली आऊँगी,बिना रोष के
तुम्हारा साथ पाकर फिर से
शायद इस लुत्फ़ भरी ज़िन्दगी में
फिर कोई नया सबक जोड़ लूँगी
पर आश्वस्त रहना तुम
तुम्हारा सम्मान हमेशा की तरह
वैसे ही संजो कर रखूंगी।
