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PRATTUSHA SINGH

Abstract

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PRATTUSHA SINGH

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सवाल - जवाब

सवाल - जवाब

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ऐ ज़िंदगी,

हैरान हूं मैं भी तेरे सवालों से ,

मैं एक का जवाब ढूंढ़ती हूं 

और तू दूसरा सवाल खड़ा कर देती है ,

जब भी लगता है कि ,

तेरे हर सवाल का भान है मुझे ,

तू ये साबित कर ही देती है कि ,

पहलू बहुत हैं जिससे अंजान हूं अभी ,

झड़ी सी लग गई है तेरे सवालों की ,

और इक तेरा इम्तिहान है ...

जो खत्म ही नहीं होता ,

अक्सर बिखेर देती है तू मेरे वजूद को ,

मोतियों की माला की तरह ,

पर क्या करूं...

ज़िद्दी हूं ना तेरी ही तरह ,

इसीलिए ,

बहुत देर मेरा बिखरना भी रहता नहीं ,

हैरान हूं कुदरत के करिश्में से , कि

जहां उम्मीद नहीं होती , वहां ये थाम लेती है ,

बिखर जाऊं मैं हद से ज्यादा ,

उससे पहले ये धागा थाम लेती है,


एक कविता की कुछ पंक्तियां पढ़ी थी पहले ,

कि ......

ज़िंदगी की राह में हर पल कोई अपना मुझे छलता रहा ",

पर मुसाफिर था मैं, 

मैं फिर भी अपने सफ़र में चलता रहा ,

चिर - परिचित सा अंदाज़ सबका ,

पर मन में सबके चोर है ,

यहां गवाही किसकी लें जनाब ,

यहां तो पुलिस भी अब चोर है ,

सत्य तो अब ये ही है कि,

चहुं ओर मायाजाल है ,

हर बात छल , हर साथ छल ,

सब चल - अचल छल ही लगे ,

कुछ मोह था , बिछोह था ,

छल से भरा हर पल लगे ।

 


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