सुकून का एहसास
सुकून का एहसास
जब पृथक हो तुमसे ,
समझ तुम्हें अपनी कमज़ोरी,
इस राह पर अकेला चल पड़ा
वो आँचल तुम्हारा ,
हर ग़म के थपेड़े से बचाने
चेहरे पर मेरे पड़ा
ना गर्मी , ना धूल, न तपते रेगिस्तान के शूल
बस एक शीतल एहसास में था मशगूल
वो आँचल तुम्हारा, वो स्पर्श....
ऐसा था उसका सुकून

