सुखद अनुभूति
सुखद अनुभूति
एक दिन में छत की मुंडेर पर
खड़ी खड़ी आसमां की ओर,
टकटकी लगाये कुछ पलों को
याद कर मुस्करा रही थीं।
आकाश में पंछियों की टोली
इधर उधर से मंडराते हुई,
जाने कोई संदेश किसी को देने
की चाह में पंखों को फैला रही थी।
तभी एक कागज़ का टुकड़ा
मेरे हाथ में एक शख्स थमा गया,
कागज़ के टुकड़े पर लिखे
संदेश को पढ़ मैं मुस्करा रही थी।
कलम की पुजारिन थी अपने
भावों को पन्ने पर उतारती थी,
कहीं भेजी थी कविताएँ मुकाबले में
प्रथम आई तो मुस्करा रही थी।
जिंदगी में मेहनत का फल
अवश्य मिलता है समय आने पर,
कागज़ के टुकड़े को हाथों में ले
बार बार चूम कर मुस्करा रहीं थीं ।।
