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श्रेया जोशी 'कल्याणी'

Abstract

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श्रेया जोशी 'कल्याणी'

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सती का आत्मदाह

सती का आत्मदाह

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पुराण बताते हैं,

वही कथा आज विप्र सुनाते हैं,

उन्हीं में से एक कथा आज हम भी उठाते हैं,

माता सती के आत्मदाह का मूल कारण बताते हैं.

दक्ष प्रजापति को ब्रह्मदेव सृष्टि का नायक बनाते हैं,

फिर एक सभा बुलाते हैं,


सभा में जब दक्ष प्रजापति आते हैं,

उपस्थित सभी सम्मानवश खड़े हो जाते हैं,

ब्रह्मदेव और शंभू बैठे रह जाते हैं,

पिता ब्रह्मदेव को प्रजापति शीश नवाते हैं, 

शिव पर आग बबूला हो जाते हैं,


जामाता होकर श्वसुर का सम्मान करना नहीं जानते,

ऐसा कहकर शिव का अपमान कर डालते हैं,

शिवजी तो भोले भाले अपना घोर अपमान भी भूल जाते हैं.

दक्ष प्रजापति अहंकार के मद में चूर,

नहीं भूल पाते वह घटना जिसे अपना अपमान बताते हैं,


बदले की भावना से भव्य यज्ञ का आयोजन कराते हैं.

देव ऋषियों सहित जामाता चंद्रदेव भी निमंत्रण पाते हैं,

केवल शिव ही उपेक्षित किए जाते हैं,

पत्नी, भाई व पिता बहुत समझाते है,

दक्ष सभी पर क्रोधित हो जाते हैं.


देवी सती के कान जब यह सूचना पाते हैं,

उनके हृदय में क्रोध के अंगारे फूट जाते हैं.

सती पिता से कारण जानने को आतुर यज्ञ स्थल पर जाती हैं,

पूछने पर पिता पुनः शिव को अपशब्द सुनाते हैं,

माता सती के कान उन्हें सह नहीं पाते हैं, 


माता उसी पावन यज्ञकुंड में प्रवेश कर जाती हैं,

विवाहित पुत्री का पिता के घर आकर आत्मदाह करना,

पिता के लिए अक्षम्य पाप है,

यह पिता के विनाश का कारण बनता है,

ऐसा वहाँ उपस्थित ऋषि बताते हैं,

सृष्टि के नायक अपनी भूल पर बड़ा पछताते हैं।


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