सृष्टि चक्र
सृष्टि चक्र
लोक प्रभा प्रकाश रहित सब, घेरा अंधकार ने डाला था
बृहत खंड एक प्रकट हुआ तब, लोकसृष्टा का जिसमे बसेरा था।।
'ॐ' शब्द प्रकट हुआ, जो अनंत, परब्रह्मा अविनाशी था
हुए सूर्यदेव के रूप, सात उपस्थित, जो सृष्टि का आदि-अंत न मध्य था।।
ब्रह्मजी रूप में जन्म जो देते, बने, विष्णु रूप में पालनहार
जन्म-मरण के चक्र से छुड़ाने,आए महेश रूप में धर अवतार।।
ऋचाएं प्रकट हुई तब प्रथम मुख से, तेजोमय, सत्वगुण जिसका स्वरूप हुआ
जपाकुसुम सा वर्ण था उसका, मंत्र प्रभाव, ऋग्वेद में गहरा था।।
रजोगुण की प्रधानता जिसमे, यजुर्वेद, हुआ दक्षिण मुख से प्रकट था
स्वर्ण के जैसा रंग था उसका, वैसा रूप ब्रह्माजी था।।
निकल आए सामवेद के छंद भी, तमोगुण का जिसमे समावेश हुआ
पश्चिम मुख से हुआ उपस्थित, देवताओं का जो प्रिय था।।
भ्रमर रंग का अर्थववेद जो, उत्तर मुख से प्रकट हुआ
रजो-तमोगुण की प्रधानता जिसमे, कर्मकांडो की आधारशिला था।।
प्रकट हुए सप्त ऋषिगण, सृष्टि का जिनसे विस्तार हुआ
पितर, देवता-असुर फिर मनुष्य जन्मे, जग पशु-पक्षी,जीव-जंतु से भर गया था।।
पंचतत्वों ने प्रभाव दिखाया, इंद्रियां-कर्मेंद्रियां का जाल बुना
अहम,मोह-माया,काम-क्रोध जीवन में भर, नृप मन ने, विषयों का अश्वरथ हांका था।।
बने, धर्म-कर्म के नियम भी सारे, फिर, स्वर्ग-नरक, पाताल बना
कर्म रूप सब हुए व्यस्थित, ऐसे, सृष्टि चक्र विस्तार हुआ।।
