एक पिता
एक पिता
इम्तेहान की घड़ी इतिहास के हर पन्ने को चिर फांर कर न जाने कितने ही सदियों से लेकर आ रहे हैं नया अवतार।
कानो मे झुमके,आंखो में काजल,लाज की घूंघट ओरकर हर दिन एक नया सबेरा के साथ लड़किया आगे बढ़ रही है।
कभी कलम के साहारे तो कभी एक मां के रूप में जन्म देती हुई एक देवी,
कभी चट्टान के तरह मजबूत तो कभी फूलो की तरह कोमल ,
कभी प्रतिबाद में डूबा हुआ एक अल्फाज़ तो कभी किसी की जीवन में एक उधार जो कभी किसी ने चुकता नही कर सकता।
खिलखिलाती हुई चहरे के पीछे छुपी है गहरी राज जिसे सम्मुख आंदोलन में शामिल कोई प्रत्यक्ष रूप से भी जाना जाता है।
एक चेहरा जो झुरिओ से भरा,न जाने कितने ही दिन उन्होंने अपने परिवार के खातिर खुद की अरमानों को त्याग करती हुई आई ।
लड़किया जो खामोश है पर अबला नहीं,
लड़किया जो कोमल हे पर समाज की वो मुख्य अंगश है जिसके बिना ए समाज को कल्पना भी नहीं कर सकते ।
उसे ऊंची उड़ान भरने दो,जीने दो उसे जिस तरह वो जीना चाहती हैं।
समाज के गंदे सोच को उसपर मत थोंपो,उसे आजादी चाहिए,
जिस तरह मंदिर में मां काली, सरस्वती,चामुंडे,दुर्गा ,लक्ष्मी जी को पूजते आए हो उस तरह हर नारी को उसकी सम्मान मिलनी चाहिए।
नारी समाज की वो ताकत है,वो जुनून है जिसके बिना हम सब बस नाचार है,
इस भीड़ बाजार में जिस्म की सौदा करने वाली वो औरत जो न जाने कितने दिक्कत का सामना करती आई है,उसका भी कोई न कोई मजबूरिया जरूर होगी,
उसे भी प्राप्त सम्मान मिलने का हक है,
नारी के बिना इस इंसानियत और सभ्यता कभी आगे नही बर सकता,बस उसे अपने दिल में जगह दो,
खुद भी आगे बढ़ते रहो और उसको भी साथ लेकर चलो ।
