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Ajay Singla

Inspirational

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Ajay Singla

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श्रीमद्भागवत -३१० ; एक तितिक्षु ब्राह्मण का इतिहास

श्रीमद्भागवत -३१० ; एक तितिक्षु ब्राह्मण का इतिहास

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श्रीमद्भागवत -३१० ; एक तितिक्षु ब्राह्मण का इतिहास


श्री शुकदेव जी कहें, हे परीक्षित

ऐसे प्रार्थना की जब उद्धव जी ने

श्री कृष्ण ने तब कहा था

उनके प्रश्न की प्रशंसा करते हुए ।


“ वृहस्पत्ति जी के शिष्य उद्धव जी

इस संसार में नहीं मिलते

ऐसे संतपुरुष जो कटुवाणी से

बींधे हुए हृदय को सँभाल सकें ।


महात्मा लोग इस विषय में

एक प्राचीन इतिहास हैं कहते

जिसमें एक ब्राह्मण भिक्षुक को

बहुत सताया था दुष्टों ने ।


उसने धैर्य ना छोड़ा और

पूर्वजन्म का फल समझकर इसे

मानसिक उद्ग़ार अपने

इस प्रकार प्रकट किए थे ।


प्राचीन समय की बात है ये

ब्राह्मण एक रहता उज्जैन में

खेती, व्योपार आदि करके

बहुत धन, संपत्ति इकट्ठी की उसने ।


बहुत कृपण, कपटी, लोभी वो

बात बात में क्रोध था करता

धर्म कर्म से दूर रहता वो

स्वयं भी धन को ना भोगता ।


उसके बुरे स्वभाव के कारण

भाई बंधु दुखी रहते थे

मन ही मन उसके अनिष्ट की

बातें वो किया करते थे ।


कोई भी ऐसा व्यवहार ना करता

जो उसके मन को प्रिय लगे

वह ब्राह्मण तो गिर गया था

लोक परलोक दोनों ही में ।


बस धन की रखवाली करता

यक्षों के समान पड़ा पड़ा वहीं

ना तो धर्म करता वो धन से

ना तो भोगता उससे भोग ही ।


बहुत दिनों तक इस प्रकार ही

जीवन ऐसे ही बिताने से

पंचमहायज्ञ के भागी देवता

उस ब्राह्मण पर बिगड़ गए थे ।


तिरस्कार से उन देवताओं के

सहारा उसके पूर्व पुण्यों का

जिसके बलपर अबतक उसने सब

धन इकट्ठा किया, वो जाता रहा ।


उसकी आँखों के सामने ही

नष्ट भ्रष्ट हो गया धन वो

कुछ कुटुम्बियों ने छीन लिया

चोर ले गए थे कुछ धन को ।


कुछ आग लग जाने आदि

दैवीकोप में नष्ट हो गया

सारी संपत्ति जाती रही उसकी

सम्बंधियों ने भी मुँह मोड़ लिया ।


चिंता ने मन घेर लिया उसका

मन भर गया उसका खेद से

परंतु इस तरह चिंता करते हुए

दुखवृति हो गई संसार से ।


वैराग्य का उदय हो गया

मन ही मन वो कहने लगा

“ बड़े खेद की बात कि मैंने

अब तक अपने को बहुत सताया ।


जिस धन के लिये सरतोड़ परिश्रम किया

धर्म में लगा वह ना तो

और ना मेरे सुख भोग के

लिए ही काम आया धन वो ।


सुख नहीं मिलता कभी भी

कृपण पुरुषों को इस धन से

इस लोक में रक्षा की चिंता

मरने पर नर्क में जाते ।


पानी फेर देता है ये

लोभ जो तनिक सा भी हो तो

यशस्वीयों के यश पर और

गुणियों के गुणों पर वो ।


धन कमाने, फिर बढ़ाने में

रखने और खर्च करने में उसको

तथा नाश,उपभोग में उसके

सभी जगह निरन्तर देखो तो ।


परिश्रम, भय, चिंता, भ्रम का

सामना करना पड़ता है उसे

पंद्रह अनर्थ मनुष्यों के हैं जो

धन के कारण ही माने गये ।


चोरी, हिंसा, झूठ बोलना , दम्भ, काम

क्रोध, गर्व, अहंकार, भेदबुद्धि

वैर, अविश्वास , स्पर्धा

लंपटता, जुआ और शराब ये सभी ।


कल्याणकारी पुरुष को चाहिए

कि इन अनर्थो को दूर से ही छोड़ दे

भाई बंधु, स्त्री पुत्र, माता पिता

धन के कारण शत्रु बन जाते ।


थोड़े से धन के लिये ही

क्षुब्ध और क्रुद्ध हो जाते हैं

सौहार्द, संबंध छूट है जाता

लाग, डाट रखने लगते है ।


एकाएक प्राण लेने देने पर

उतारू हो जाते हैं वे

यहाँ तक कि एक दूसरे का

सर्वनाश कर डालते हैं वे ।


देवताओं के भी प्रार्थनीय मनुष्य जन्म का

और उनमें भी श्रेष्ठ ब्राह्मण शरीर को

प्राप्त करने के बाद भी

अनादर करते मनुष्य जो ।


अपने स्वार्थ और परमार्थ का

नाश करते हैं और वे

मरने के बाद में भी

अशुभ गति को प्राप्त होते ।


मोक्ष और स्वर्ग का द्वार है

यह मनुष्य शरीर और उसको

पाकर कौन बुद्धिमान पुरुष चाहता

पाना अनर्थ के धाम इस धन को ।


मनुष्य, देवता, ऋषि, पितर

प्राणी, जातीभाई, कुटुम्भी

और उनके दूसरे भागीदारों को

उनका भाग दे रखता सन्तुष्ट नहीं ।


और स्वयं ही उसका उपभोग करे

रखवाली करे उसकी यक्ष समान ही

अधोगति को प्राप्त होता है

वह कृपण तो अवश्य ही ।


तितिक्षु ब्राह्मण कहे कि मैं तो

अपने कर्तव्य से च्युत हो गया

मैंने प्रमाद में अपनी आयु, धन 

और बल पौरुष खो दिया ।


विवेकी लोग जिन साधनों से

मोक्ष को प्राप्त कर लेते

मैंने खो दिया व्यर्थ चेष्ठा में उन्हें

धन इकट्ठा करने के लिए ।


कौन सा साधन करूँ अब बुढ़ापे में

और पता नहीं बड़े बड़े विद्वान भी

ना जाने क्यों मोहित होते हैं

व्यर्थ तृष्णा में इस धन की ।


हो ना हो अवश्य ही संसार ये

किसी की माया से मोहित हो रहा

यह मनुष्य तो हर समय

काल के विकराल गाल में पड़ा ।


लाभ ही क्या इसका धन से

धन देने वाले देवताओं, लोगों से

और जन्म मृत्यु के चक्र में

डालने वाले सकाम कर्मों से ।


प्रसन्न भगवान मुझसे, तभी तो

मुझे पहुँचाया इस दशा में

और जगत के प्रति दुख बुद्धि 

और वैराग्य दिया मुझे ।


संसार सागर से पार होने को

ये वैराग्य नौका समान है

यदि मेरी आयु शेष है तो

आतमज्ञान से संतुष्ट रहकर मैं ।


अपने परमार्थ के संबंध में

सावधान हो, बचे हुए समय में

मैं अपने शरीर को ही

सुखा डालूँगा तपस्या करके ।


निराश होने की बात नहीं इसमें

क्योंकि राजा खटवाँग ने तो

घड़ी में ही भागवतज्ञान की

प्राप्ति कर ली थी उन्होंने ।


भगवान कृष्ण कहते हैं, उद्धव

इस प्रकार ब्राह्मण ने निश्चय कर

मैं, मेरेपन की गाँठें खोल दी

रहने लगा मोनी संन्यासी बनकर ।


शरीर में किसी, स्थान, वस्तु या 

व्यक्ति के प्रति आसक्ति छोड़कर

मन इंद्रियाँ प्राणों को वश में कर

स्वच्छंद रूप से विचरे पृथ्वीपर ।


भिक्षा के लिए नगर, गाँव जाये जब

कोई उसे पहचान ना पाता

अवधूत बहुत बूढ़ा हो गया

दुष्ट तिरस्कार करते उसका ।


कोई उसका दण्ड छीन ले

भिक्षापात्र ले जाता कोई

कोई कमण्डल उठा ले जाये

कोई छीन ले माला रुद्राक्ष की ।


कोई मूत दे, थूक दे उसपर

कोई लँगोटी उसकी ले जाये

वाद विवाद करें उससे और

ना बोले तो उसे पीटदे ।


रस्सी से बांध देता कोई

कोई कहे धर्म का ढोंग रच रहा

धन संपत्ति जाती रही, इसलिए

भिक्षा का रोज़गार कर लिया ।


कोई हसीं उड़ाता उसकी

कोई बंद कर देता घर में

किंतु सब चुपचाप सह लेता

कुछ भी ना कहता वो उनसे ।


ज्वर के कारण दैहिक पीड़ा कभी

दैवी कष्ट गर्मी सर्दी आदि से

अपमान आदि मौलिक पीड़ा

पहुँचाते कभी दुर्जन लोग उसे ।


परंतु भिक्षुक के मन में इससे

विकार ना होता कोई भी

मेरे पूर्व कर्मों का फल ये

वो तो समझता बस यही ।


अवश्य भोगना पड़ेगा मुझे इसको

दृढ़ता से स्थित रहता वो धर्म में

सात्विक धैर्य का आश्रय लेकर

उदगार प्रकट करता वो ऐसे ।


ब्राह्मण कहता मेरे सुख दुख का

कारण ना मनुष्य है, देवता भी नहीं

ना शरीर है ना कोई ग्रह

ना तो हैं कर्म और काल आदि ।


श्रुतियाँ और महात्माजन मन को

ही कारण बताते इसका

और ये मन ही इस सारे

संसार चक्र को चला रहा ।


बहुत ही बलवान है मन ये

विषयों और गुण जो कारण उनके

और सम्बन्ध रखने वाली उनसे

वृत्तियाँ जो, सृष्टि की उनकी, इसी ने ।


उन वृत्तियों के अनुसार ही

सात्विक, राजस, तामसिक कर्म होते

और उनकी त्रिविध गतियाँ होतीं

होतीं अनुसार इन्हीं कर्मों के ।


समस्त चेष्टाएं करता मन ही

उसके साथ रहने पर भी

आत्मा तो निष्क्रिय ही है

ज्ञान शक्तिप्रधान है वही ।


मुझ जीव का सनातन सखा है

और अपने अलुप्त ज्ञान से

सब कुछ देखता रहता है

उसकी अभिव्यक्ति होती है मन से ।


जब वह मन को स्वीकार कर

विषयों का भोक्ता बन बैठे

तब कर्मों संग आसक्ति होने से

वह बंध जाता है उनसे ।


ज्ञान, धर्म का पालन, नियम, यम

वेदाध्ययन, ब्रह्मचर्य, व्रत आदि

मन एकाग्र हो भगवान में लग जाये

इन सबका अंतिम फल बस यही ।


समाहित होने की मन के

हम परमयोग हैं कहते

मन शांत और समाहित है जिसका

सत्कर्मों का प्राप्त हो चुका उसे ।


और जिसका मन चंचल है अथवा 

आलस्य से अभिभूत हो रहा

उसको इन दानादि शुभकर्मों से

अब तक कोई लाभ ना हुआ ।


सभी इंद्रियाँ हैं मन के वश में

मन किसी इंद्रिय के वश में नहीं

जो मन को वश में कर लेता

वह विजेता इंद्रियों का भी ।


बहुत बड़ा शत्रु ये मन है

असह है आक्रमण इसका

यह बाहरी शरीर को ही नहीं

ह्रदयादि को भी बेंधता रहता ।


इसे जीतना बहुत कठिन है

और मनुष्य को ये चाहिए

कि पहले सबसे बड़े अपने

इस शत्रु पर विजय प्राप्त करे ।


परंतु होता ये है कि मूर्ख लोग

इसने जीतने का प्रयास करते नहीं

और झगड़ा करे दूसरे लोगों से

और जगत के लोगों को ही ।


मित्र, शत्रु, उदासीन बना लेते

अंधी हो रही बुद्धि मनुष्यों की

तभी तो इस मन कल्पित शरीर को

मान बैठे मैं और मेरा ही ।


फिर भ्रम के फंदे में फँस जाते

कि ये मैं और यह हमारा

अज्ञान अंधकार में भटकते और

इससे यह परिणाम है होता ।


यदि मान लें कि मनुष्य ही

कारण है दुख और सुख का

तो भी क्या संबंध है

इस सबसे इस आत्मा का ।


क्योंकि सुख दुख पहुँचाने वाला

ये शरीर तो है मिट्टी का

और मिट्टी का ही है

वो शरीर जो उसको भोगता ।


देवताओं को दुख का कारण मानें जो

तो भी आत्मा को क्या हानि इससे

क्योंकि इन्द्रियाभिमानी देवताओं के रूप में

भोगते भी तो वह ही इसे ।


तो भला किस पर क्रोध किया जाये

और यदि हम ऐसा मानें कि

आत्मा सुख दुख का कारण तो

वह तो है अपना आप ही ।



कोई दूसरा नहीं है क्योंकि

आत्मा से भिन्न कुछ है ही नहीं

कोई दूसरा प्रतीत होता यदि

वह सब तो बस है मिथ्या ही ।


इसलिए ना सुख और ना दुख है

फिर क्रोध कैसा, उसका निमित्त ही क्या

सुख दुख का निमित मानें यदि ग्रहों को

तो उससे भी क्या नुक़सान आत्मा का ।


उसका प्रभाव भी तो होता है

जन्म मृत्यु शील एक शरीर परही

ग्रहों की पीड़ा भी तो है होती उसके

प्रभाव ग्रहण करने वाले शरीर की ।


आत्मा सर्वथा परे है

उन गुणों और शरीर से

उद्धव, तुम ही बतलाओ तब

वह किस पर क्रोध करे ।


सुख दुख का कारण मानें कर्मों को

तो क्या प्रयोजन आत्मा का उससे

क्योंकि वे तो एक पदार्थ

जड़ चेतन होने पर ही हो सकते ।


किंतु देह तो अचेतन है

और आत्मा रहती है उसमें जो

रहती है वो पक्षी रूप में

निर्विकार, आदिमात्र है वो ।


इस तरह कर्मों का तो कोई

आधार ही सिद्ध नहीं होता

सुख दुख का कारण मानें काल को तो

क्या प्रभाव आत्मा पर उसका ।


क्योंकि काल तो आत्मा स्वरूप ही

जला ना सके आग जैसे आग को

और ऐसे ही वर्षा भी

ना गला सके वर्षा को ।


वैसे ही आत्मारूप काल ये

आत्मा को सुख दुख ना पहुँचा सके

और जो यह मान लिया तो

तब किस पर क्रोध किया जाये ।


शीत -उषण, सुख - दुख आदि द्वन्दों से

सर्वथा अतीत है आत्मा तो

प्रकृति के स्वरूप, धर्म, कार्य, लेश 

सम्बन्ध एवं गंध से भी रहित वो ।


उससे कभी कहीं किसी के द्वारा

किसी भी द्वन्द का स्पर्श ही नहीं होता

वह तो जन्म मृत्यु के चक्कर में

भटकने वाले अहंकार को होता ।


जो इस बात को जान लेता है

किसी भय से भयभीत नहीं होता

बड़े बड़े ऋषि मुनियों ने इस

परमात्मनिष्ठा का आश्रय ग्रहण किया


मैं भी आश्रय ग्रहण करूँगा इसका

और मुक्ति तथा प्रेम के द्वारा

प्रभु के चरणकमलों की सेवा से

अज्ञान सागर को पार कर लूँगा ।


भगवान श्री कृष्ण कहें, उद्धव

उस ब्राह्मण का धन क्या नष्ट हुआ

वैराग्य हो गया था उसको

उसका सारा क्लेश दूर हुआ ।


संसार से विरक्त हो गया वो

संन्यास लेकर स्वच्छंद विचर रहा

दुष्टों ने यद्यपि बहुत सताया उसे

परंतु धर्म पर वो अटल रहा ।


तनिक भी विचलित ना हुआ वो

उस समय मोनी अवधूत वो

इस प्रकार गीत गाता था

अपने मन ही मन में वो तो ।


उद्धव जी, इस संसार में

मनुष्य कोई भी दूसरा

सुख, दुख नहीं दे सकता

भ्रममात्र यह तो उसके चित का ।


यह सारा संसार और इसके

भीतर मित्र, उदासीन , शत्रु के

भेद बस अज्ञान कल्पित हैं

और उद्धव जी इसीलिए ।


वृत्तियों को मुझमें तन्मय कर दे

मन को वश में करलो अपने

और मुझमें ही नित्यमुक्त होकर

मुझमें ही स्थित हो जाये ।


बस सारे योग साधना का

इतना ही संग्रह है सारा

यह भिक्षुक का गीत क्या है

मूर्तिमान ब्रह्मज्ञान निष्ठा ।


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