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Ajay Singla

Classics


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Ajay Singla

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श्रीमद्भागवत -१८९ ;क्षत्रवृद्ध, रजि आदि राजाओं के वंश का वर्णन

श्रीमद्भागवत -१८९ ;क्षत्रवृद्ध, रजि आदि राजाओं के वंश का वर्णन

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श्री शुकदेव जी कहते हैं, परीक्षित 

पुरुरवा का एक पुत्र आयु था 

उसके पांच लड़के हुए थे 

नहुष, क्षत्रवृद्ध, रजि, रम्भऔर अनेना। 


क्षत्रवृद्ध के पुत्र थे सुहोत्र 

सुहोत्र के तीन पुत्र थे 

काश्य, कुश, मृत्समद नाम था 

 मृत्समद के पुत्र शुनक हुए। 


शुनक के ऋग्वेदियों में श्रेष्ठ 

मुनिवर शौनक जी हुए थे 

काश्य के काशी , उनके राष्ट्र 

उनके दीर्घतमा, धन्वंतरि थे उनके। 


आयुर्वेद के प्रवर्तक हैं यही 

यज्ञभाग के भोक्ता भी ये 

वासुदेव के अंश, इनके स्मरण से ही 

रोग दूर हों सब प्रकार के। 


धन्वंतरि का पुत्र केतुमान 

केतुमान का भीमरथ हुआ 

भीमरथ का पुत्र दिवोदास 

द्युमान दिवोदास का पुत्र था। 


द्युमान का नाम प्रतर्दन भी है 

और कई नाम से प्रसिद्ध ये 

शत्रुजित, वत्स,ऋतध्वज,कुवलाशव 

ये सभी नाम भी हैं इसके। 


द्युमान के पुत्र अलर्क आदि हुए 

युवा रहकर इसी अलर्क ने 

छाछठ हजार वर्ष तक पृथ्वी का राज किया 

ऐसा इस के सिवा किया न किसी ने। 


अलर्क का पुत्र सुनतनी हुआ 

सुनतनी का सुनीथ, सुकेतन सुनीथ का 

उसका धर्मकेतु, सत्यकेतु उसका 

धृष्टकेतु सत्यकेतु का, सुकुमार था उसका। 


सुकुमार के वीतिहोत्र, वीतिहोत्र के भर्ग 

भर्ग के राजा भार्गभूमि हुए 

काशि से उत्पन्न सब ये नरपति 

क्षत्रवृद्ध के वंश में हुए। 


रम्भ के पुत्र का नाम रभस था 

उसके गंभीर, उसके अक्रिय हुए 

और ब्राह्मण वंश चला था 

इसी अक्रिय की पत्नी से। 


अनेना का पुत्र शुद्ध था 

उसका शुचि, शुचि का त्रिककुद था 

त्रिककुद से धर्मसारथी हुआ 

शान्तरय पुत्र धर्मसारथी का। 


शान्तरय कृतकृत्य थे 

क्योंकि वे आत्मज्ञानी थे 

भगवान् में रमे रहते वो 

संतान की आवश्यकता न उन्हें। 


आयु के पुत्र रजि के 

अत्यंत तेजस्वी पुत्र थे पांच सौ 

दैत्यों का वध कर रजि ने 

स्वर्ग का राज्य दिया इंद्र को। 


परन्तु इंद्र भयभीत रहते थे 

प्रह्लाद आदि शत्रुओं से अपने 

इसलिए रजि को लौटा दिया 

स्वर्ग का राज्य उन्होंने। 


और अपनी रक्षा का भार भी 

चरण पकड़कर सौंप दिया उन्हें 

रजि की जब मृत्यु हो गयी 

इंद्र ने माँगा राज्य उनके पुत्रों से। 


परन्तु रजि के पुत्रों ने 

स्वर्ग न दिया था इंद्र को 

और यज्ञ का भाग भी 

ग्रहण करने लगे स्वयं वो। 


इंद्र की प्रार्थना से वृहस्पति ने 

हवन किया अभिचार विधि से 

पुत्र रजि के सब भ्रष्ट हो गए 

इसके कारण वो धर्म से। 


अनायास ही तब इंद्र ने 

मार डाला उन सभी पुत्रों को 

कोई भी न बच पाया उनमें से 

मारे गए सभी के सभी वो। 


क्षत्रवृद्ध से पौत्र कुश का पुत्र प्रति हुआ 

प्रति का संजय, उसका जय हुआ 

जय का कृत, कृत का हर्यवन   

और सहदेव हुआ हर्यवन का। 


सहदेव का हीन, हीन का जयसेन हुआ 

जयसेन के सड़:कृति हुए 

सड़:कृति से जय, और ये सब 

नरपति हुए क्षत्रवृद्ध के वंश में। 


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