शिर्षक:- कैसे बताऊँ मैं कि मैं किस हाल में हूँ!
शिर्षक:- कैसे बताऊँ मैं कि मैं किस हाल में हूँ!
किताबों से लड़ना अब बहुत जटिल हो रहा,
पर लड़ाई छोड़कर भागूं कोई और रास्ता भी नहीं है।
एक समय से जब आप 3/4 वर्षों से पढ़ नहीं रहे हों,
सिर्फ पढ़ने की नाटक कर रहे हो,
और अचानक आपको कुछ करने का
अत्यधिक दबाब मिलना शुरू हो जाए,
तो जिंदगी कुछ ऐसे दौड़ में शामिल होता है
जहाँ आपको किसी प्रकार की खुशियाँ नहीं चाहिए होता है।
सच कहूं तो, किसी- किसी वक्त कुछ ऐसा प्रतीत होता है
जैसे मैंने अपना वो समय खो दिया जो मुझे
माता- पिता जी के तरफ़ से गिफ्ट में मिला था,
मैंने वो दौर देखा है जहाँ घर में खाने को एक वक्त का रोटी नहीं था,
पर मुझे पढ़ने के लिए खाने के लिए पहनने के लिए हजारों रूपये दिए गए !
क ई लोग हमसे उम्मीद लगाए लगाए गुजर गएं तो कई लोग
आज भी टकटकी लगाए बैठें हैं पर हम आज भी यह सोच रहे
कि करें तो क्या करें, क्या कर्ज अदा करें या फर्ज।
इसे पढ़ने के बाद एक सवाल उठना लाजमी है:-
यदि सभी विपरीत परिस्थितियों से अबगत हो तो कुछ करते क्यूँ नहीं ?
हाँ रोचक सवाल है और यही सवाल मैं हर वक़्त खुद से पूछता हूँ
और जब सवाल का उत्तर नहीं मिलता तो,
मोबाइल में कहीं सिमट कर हर दिन दम तोड़ देता हूँ।
क्या मैं पागल हूँ या हो रहा हूँ अगर मुझे बहुत प्यार करते हो,
पसंद करते हो तो जवाब सच देना, अधूरा युवा।
