शब्द कचरा नहीं होते
शब्द कचरा नहीं होते
किसी ने शब्दों को ,कचरे का निवाला बना डाला ,
अरे ये शब्द ही हैं ज़िन्होने ,उसे अब तक है पाला।
शब्द कचरा नहीं होते ,ये एक भाव बनते प्यारे ,
कोई लेखक कैसे भला इनको ,कचरा बना परोसेगा प्यारे ?
ये कहना बिल्कुल गलत है ,कि अपने दिमाग का कचरा ,
लेखक ने शब्दों के सहारे ,किसी कागज़ पे दे पसरा।
ज़रा पूछे वो अपने दिल से ,क्या वो खुद कचरा फैलाता है ?
अगर नहीं तो फिर क्यूँ ,औरों को ऐसे जलाता है.
लेखक की लेखनी लिखती है वही ,जिसमे कई भाव होते हैं ,
ऐसे लेखों का क्या उपयोग ,जिनमे कई दाग होते हैं.
इसलिये कुछ भी लिखने से पहले ,थोड़ा सोच कर लिखें ,
हजारों लेखकों की भावनायों को ,ऐसे कभी ना कुचलें।।
