सब त्राहिमाम
सब त्राहिमाम
शिक्षा और बेरोजगारी मचल रही
आड़े इनके सत्ताधारी संभल रहा
मजदूर की चमड़ी झुलस राही
प्रकृति की भी बिजली कड़क रही
त्राहिमाम त्राहिमाम की किरण चमक रही
बीमारी जकड़ रही
भ्रष्टाचार दमक रहा
सत्तादार चमक रहा
फिर भी मानव मौन रहा
त्राहिमाम त्राहिमाम सब हो रहा
परमात्मा भी चौक रहा
बेजुबान जानवर भौंक रहा
सत्य का रखवाला
अब कौन रहा अब कौन रहा
न्याय न्यायालय की मूरत बन रहा
हिंसा का चलन चल रहा
अहिंसा का रखवाला अब कौन रहा
विरोध भी अब थक रहा
त्राहिमाम त्राहिमाम सब हो रहा
खुद को ही मानव कहां खो रहा
विश्वास की माला टूट रही
प्रेम की डोरी छूट रही
वास्तविकता बस झूठ रही
आस की आंखें सूख रही
प्यास की आंखें खून रही
प्रेम की आंखें मूंद रही
प्रेम की मंजिल झूठ रही
समय की दिशा बदल रही।
