STORYMIRROR

KHUSHNUMA BI

Tragedy

4  

KHUSHNUMA BI

Tragedy

सब त्राहिमाम

सब त्राहिमाम

1 min
442


शिक्षा और बेरोजगारी मचल रही

आड़े इनके सत्ताधारी संभल रहा

मजदूर की चमड़ी झुलस राही

प्रकृति की भी बिजली कड़क रही

त्राहिमाम त्राहिमाम की किरण चमक रही

बीमारी जकड़ रही

भ्रष्टाचार दमक रहा

 सत्तादार चमक रहा

फिर भी मानव मौन रहा

त्राहिमाम त्राहिमाम सब हो रहा 

परमात्मा भी चौक रहा

बेजुबान जानवर भौंक रहा

सत्य का रखवाला

अब कौन रहा अब कौन रहा

न्याय न्यायालय की मूरत बन रहा

हिंसा का चलन चल रहा

अहिंसा का रखवाला अब कौन रहा

विरोध भी अब थक रहा

त्राहिमाम त्राहिमाम सब हो रहा

खुद को ही मानव कहां खो रहा

विश्वास की माला टूट रही

प्रेम की डोरी छूट रही

वास्तविकता बस झूठ रही

 आस की आंखें सूख रही

प्यास की आंखें खून रही

प्रेम की आंखें मूंद रही

प्रेम की मंजिल झूठ रही

समय की दिशा बदल रही।


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Tragedy