मेघराज
मेघराज
गुस्सा है या खेल रहा ,
ऋतु के देव मेघराज ।
कभी वह्नि विनाश करें ,
कभी बने वर्षा विकराल।
कोई प्यासा तड़प रहा ,
किसी के लिए पानी मौत।
गुस्सा है या खेल रहा ,
सोचूं इस बारे में दिन-रात।
फिर इंद्र आए सपने में ,
कह डाला सारा राज।
खेल रहा हूँ गुस्से से ,
क्योंकि प्रकृति की बात ।
जब रखोगे प्रकृति को खुश,
तब सही रहेगा सब कुछ ।
