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Sunil Kumar

Abstract

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Sunil Kumar

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रंग बदलते देखा है

रंग बदलते देखा है

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इस रंग बदलती दुनिया को 

हर रंग बदलते देखा है

मैंने मौसम की तरह 

अपनों को बदलते देखा है।


बचपन के स्वप्न जवां न हुए 

सपनों को बिखरते देखा है

इक़ रंग-बिरंगे गुलशन को 

पल भर में उजड़ते देखा है। 


मासूम बचपने को 

भूख से बिलखते देखा है

मां की सूनी आंखों को 

बिन बादल बरसते देखा है।


बच्चों की खुशियों के आगे 

मां-बाप को झुकते देखा है

मैंने मौसम की तरह 

अपनों को बदलते देखा है।


कभी खुलकर हंसता था 

मैं भी तुम्हारी ही तरह 

आज पुरानी तस्वीरों में 

खुद को हंसते देखा है

इस रंग बदलती दुनिया को 

हर रंग बदलते देखा है।


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