रीती रिवाज
रीती रिवाज
बाजार से घर आते हुए मुझे रास्ते पर सहसा विदाई के संगीत की ध्वनि ने अपनी ओर आकर्षित किया शायद उन सभी को किया होगा जो शादी में बुलाए नहीं गए थे। जैसे जैसे मैं ध्वनि के करीब आ रही थी वो मुझे उस समारोह को देखने पर मजबूर कर रही थी। कुछ देर चलकर शोक में डूबा समा नजर आया जो सरकारी फील्ड पर था। एक क्षण ठहर कर मैने समारोह में झांका, बज रहे व्याकुलता को समेटे संगीत मेरे अंदर के छिपे नृत्यांगना को झकझोर रहे थे, हालाकि मुझे नृत्य आता नही है परंतु ध्वनि का तीव्र स्तर आज मुझे नचाने में तुला था जिस बीच मैं मेरे क्रोध को भूल गई जो सरकारी स्थल के ऐसे प्रयोग के लिए उमड़ा था। खैर उस प्रोयजन की बात करती हूं जिसके लिए मैं ठहरी थी,
कैमरा, लाइटिंग की चमक वहा मौजूद सभी के कपड़ो की चमक से जायदा थी जो तानाशाह बने आदेश दे रहे थे। दुल्हन भी प्राकृतिक रूप से अंदर ही अंदर रो सकती थी। तभी कैमरा हाथ में थामे तानाशाह इशारा करता है.......दुल्हन जो अभी तक आदेश के इंतजार में अपने आंसू को दबाए थी वो अब बाहरी लेप के बहने के खतरे से कुछ ही भावना को प्रकट कर सकती थी....
माता पिता बेसुद होकर बिना अच्छे दिखने के दस्तूर के रो रहे थे जिसे कैमरा वाला नही सेहजता है क्युकी वो उसके नियमों के विरुद्ध था। धीरे धीरे अच्छे दिखने की छद्म छवि हमारे प्राकृतिक जीवन को निगल रहा है, पंडित के इशारों में होने वाला विवाह अब कैमरा के इशारों पर हो रहा है... मुझे डर है कही हमारे रीति रिवाज आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचने से पहले ही अपने मूल को खोकर बस दिखावा मात्र ना बन जाए।
