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Harshita Dawar

Abstract

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Harshita Dawar

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रात चांद और एहसास

रात चांद और एहसास

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ये रात खुशनसीब है को अपने चांद को

कलेजे से लगाए सो रही है।

हमारे दिल को सिर्फ़ सुकून की तलाश है।

गमों की चादर ओढ़े यूं ही सोचते रहे।।

सुकून किसको है।।कहाँ मिलता है ये सुकून।

यही सोचते सोचते यूं ही नीदे उड़ाते रहे।

चांद भी कभी किस बदली कभी किस बदली के

साथ आंख मिचौली खेलता रहा।

यूं तारों की रोशनी में खुद की

चमक को चकाचौंध को तकता रहा।

बादल भी हवा के साथ बहता चले जा रहे है

तलाश खत्म होने तक सुर्ख लाल आसमां की तलाश में।

ये ध्रुव  तारा अकेले ही अपनी चमक से कितने के दिलों की भाषा,

उनकी अभिलाषा को सम्मपन कर रहा है।

खुद को अकेले ज़िन्दगी को महफूज़ मोहब्बत में

खुद की पहचान बनाने में कामयाब राहों पर ये शुरुवात है।

किस्तो में चलती ज़िन्दगी की मिसाल है ये ग्रह ।

क्या खेल खेलते है वहां।।

यहाँ हमारी ज़िन्दगी की कश्ती की पतवार थाम कर इशारों पर नचा लेते है।

रिश्ते रास्ते अचानक से नाटक दिखाना शुरू कर देते है।

इन सवालों से यू दिमाग़ में उमड़े ख़यालो को के समझे।

इन ग्रहो से सवाल केसे पूछे।

खुद की ज़िंदगी की पतवार कैसे खींचे।


   


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