राम सीता का प्रेम
राम सीता का प्रेम
हे सीते तेरा प्रेम मुझ से बड़ा हुआ
मैं पिता के वचनों पर अड़ा हुआ
तूने सब कुछ क्यों छोड़ा त्याग की देवी है तू
किन्तु वनवास सिर्फ मेरा हुआ।
प्रेम के बंधन को कोई तोड़ नहीं सकता है
राम को सीता से अलग कोई कर नहीं सकता है
कर नहीं सकता कोई सीता जैसा त्याग
हर कोई सीता बन नहीं सकता।
पति को जिसने हृदय माना
माना पति को परमेश्वर है
महल छोड़ कांटे चुने
उस ने ही देवर को भाई माना।
जीवन उस का संघर्ष से भरा था
महल छोड़ वन चुना था
थाली में थे 56 भोग उस के
लेकिन उसने केवल राम चुना था।
कांटो पर पग रहे मेरे
पर साथ तेरा ना छूटा
वन वन भटका मै
पर हाथ तेरा ना छूटे।
समंदर पार पाया तुझको
पत्थर पत्थर राम था
सीते लंका में अकेली थी
तुझे लेने आया तेरा राम था।
है तेरा राम तेरे प्रेम में
बरसों बीत गए तुझे उस शहर में
सीते तू मेरे प्राणों की रीत है
हर पत्थर पे लिखूं राम का नाम
बना दू एक और सेतु तेरे शहर में।
यह हाथों का मिलन छूट ना पाए
तेरी मेरी माला अब टूट ना पाए
हर जन्म में वनवास पा लूंगा
सीते मगर तेरा साथ छूट ना पाए।
मैं भगवा हूं तू उसकी
भगवाधारी बन
मैं तेरा पुरुष राम हूं
तू मेरी सीते नारी बन।
