प्यार और शादी
प्यार और शादी
सही मायने पूछो तो सही तो है
ग़र किसी ने अपना प्यार का ज़िक्र किया
यूँ खेल तो नही ताउम्र साथ बिताना
सोचा बहुत तुम्हारे बारे में और
चुन लिया एक हमसफ़र के रूप में।
माँ-बाप की हर बात का मान रखा
अब आ गयी है मेरी बारी
बिना साथ और आशीर्वाद के ये मुमकिन ना हो पाएगा
ग़र समाज खड़ा हो विरुद्ध तो कह देना
कौन सी बेटी या बेटा नही करना चाहेगा अपने मन से शादी
बस रूप रंग देखा और तय कर देते हैं ज़िंदगी
किसी को बहू मिलेगी,किसी को धन,
किसी को मिलेगी घर की इज्जत तो किसी को मिलेगा वंश,
किसी को मिलेगी घर में काम करने वाली
प्यार होगा या नहीं ये तो किसी ने सोचा नहीं
वही प्यार ग़र शादी से पहले हो जाए तो क्या बुराई है
एक दूसरे को समझने की बात भी तो आयी है।
अब तो मिलनी ही चाहिए आज़ादी प्यार और शादी की॥
