पतंग
पतंग
खींचो या छोड़ो मुझे
तेरे कर में डोर ।
जिधर इशारा करोगे
जाऊँगा उस ओर।।
लोभ मोह माया मुझे
हर-पल करते तंग ।
पर मन तेरे संग उड़े
जैसे गगन पतंग ।।
चील सरीखी मैं उड़ू
जब प्रभु देते छूट।
धागे जैसा प्रेम यह
अपना रहे अटूट।।
जब कर तेरे डोर है
मन चिन्ता नहीं व्याप्त ।
मिला सहारा आपका
इतना है पर्याप्त ।।
